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खिचड़ी को खाते ही बादशाह जहांगीर ने कहा-वाह, क्या स्वाद है

Medhaj News 15 Jan 20,19:24:26 Entertainment
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मकर संक्रांति पर खिचड़ी ना हो ऐसा तो हो नहीं सकता | यूं भी भारतीय खिचड़ी अब ग्लोबल फूड बन चुकी है | ये सेहदमंद भी है और स्वादिष्ट भी | खिचड़ी ऐसा व्यंजन है, जिसे जब मुगल बादशाह जहांगीर ने चखा तो वो भी इसका दीवाना हो गया | हालांकि पहले उसका मानना था कि ये खाना भारत में गरीब लोग खाया करते हैं | जहांगीर गुजरात की यात्रा पर गए हुए थे | वहां उन्होंने एक गांव में लोगों को कुछ खाते देखा | ये कुछ अलग था | बादशाह की भी उसे खाने की इच्छा हुई | जब उन्हें ये व्यंजन परोसा गया तो उन्हें इतना पसंद आया कि उन्होंने कहा-वाह, ये तो लाजवाब है | ये खिचड़ी थी | मूंग दाल की खिचड़ी, जिसमें चावल की जगह बाजरे का इस्तेमाल किया गया था | बादशाह को लगा कि ये व्यंजन मुगल पाकशाला में भी पकना चाहिए | तुरंत एक गुजराती रसोइया शाही पाकशाला के लिए नियुक्त किया गया | खिचड़ी शाही महल में जा पहुंची. वहां इस पर और प्रयोग हुए | वैसे कुछ लोग कहते हैं कि खिचड़ी को दरअसल शाहजहां ने मुगल किचन में शामिल किया | मुगल बादशाहों को कई तरह की खिचड़ी पेश की जाती थी | मुगल पाकशाला में एक खास किस्म की खिचड़ी विकसित की गई | जिसमें ड्राइ फ्रूट्स, केसर, तेज पत्ता, जावित्री, लौंग और अन्य मसालों का इस्तेमाल किया जाता था | जब ये पकने के बाद दस्तरखान पर आती थी, तो इसकी लाजवाब सुगंध गजब ढाती थी | भूख और बढ़ जाती थी | जीभ पर पानी आने लगता था | तब इसके आगे दूसरे व्यंजन फीके पड़ जाते थे | आमतौर पर खिचड़ी विशुद्ध शाकाहारी व्यंजन है लेकिन मुगलकाल में मांसाहारी खिचड़ी का भी सफल प्रयोग हुआ, जिसे हलीम कहा गया |





बंगाल में त्योहारों के दौरान बनने वाली खिचड़ी तो बहुत ही खास जायका लिए होती है- इसमें बादाम, लौंग, जावित्री, जायफल, दालचीनी, काली मिर्च मिलकर इसे इतना स्वादिष्ट स्वाद देते हैं कि पूछना ही क्या | असल में ये हानिरहित शुद्ध आयुर्वेदिक खाना है, जायके और पोषकता से भरपूर | वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो जब चावल और दालों को संतुलित मात्रा में मिलाकर पकाते हैं तो एमिनो एसिड तैयार होता है, जो शरीर के लिए बहुत जरूरी है | कहा जाता है कि इससे बेहतर प्रोटीन कुछ है ही नहीं | मूल रूप से खिचड़ी का मतलब है दाल और चावल का मिश्रण | क्या आपको मालूम है कि इसका असली उदगम कहां था | कहा जाता है कि इसकी शुरुआत दक्षिण भारत में हुई थी | कुछ कहते हैं कि इसे मिस्र की मिलती जुलती डिश खुशारी से प्रेरणा लेकर बनाया गया था | अब भी आप गुजरात से लेकर बंगाल तक चले जाइए या पूरे देश या दक्षिण एशिया में घूम आइए, हर जगह खिचड़ी जरूर मिलेगी लेकिन अलग स्वाद वाली | महाराष्ट्र में झींगा मछली डालकर एक खास तरह की खिचड़ी बनाई जाती है | गुजरात के भरूच में खिचड़ी के साथ कढ़ी जरूर सर्व करते हैं | इस खिचड़ी में गेहूं से बने पतले सॉस, कढी पत्ता, जीरा, सरसों दाने का इस्तेमाल किया जाता है | अंग्रेजों ने भी खिचड़ी को अपने तरीके से ब्रितानी अंंदाज में रंगा | उन्होंने इसमें दालों की जगह उबले अंडे और मछलियां मिलाईं | साथ ही क्रीम भी। फिर इस बदली डिश को नाम दिया गया केडगेरे-खास ब्रिटिश नाश्ता | एलन डेविडसन अपनी किताब आक्सफोर्ड कम्पेनियन फार फूड में लिखते हैं सैकड़ों सालों से जो भी विदेशी भारत आता रहा, वो खिचड़ी के बारे में बताता रहा | अरब यात्री इब्ने बबूता वर्ष 1340 में भारत आए | उन्होंने लिखा, मूंग को चावल के साथ उबाला जाता है, फिर इसमें मक्खन मिलाकर खाया जाता है |


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