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बीजेपी दिल्ली में अपने 22 साल के वनवास को इस बार भी खत्म नहीं कर पाई

Medhaj News 12 Feb 20 , 06:01:40 India
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अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी एक बार फिर से दिल्ली विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज करने में कामयाब रही है | वहीं, बीजेपी अपने 22 साल के वनवास को इस बार भी खत्म नहीं कर सकी, जो अब उसे सत्ता के लिए पांच साल और भी इंतजार करना पड़ेगा | इस तरह से बीजेपी की दिल्ली के सिंहासन से दूरी 27 साल तक की हो गई है | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने इस बार के चुनाव में राजधानी में कमल खिलाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी इसके बाद भी बीजेपी (भारतीय जनता पार्टी) दिल्ली का दिल नहीं जीत सकी | दिल्ली की कुल 70 विधानसभा सीटों में से आम आदमी पार्टी 62 सीटें जीतने में कामयाब रही | वहीं बीजेपी को महज 8 सीटों पर संतोष करना पड़ा है | बीजेपी को पिछले चुनाव के मुकाबले पांच सीटों का फायदा हुआ है, तो आम आदमी पार्टी को इतनी ही सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है | जबकि कांग्रेस 2015 की तरह ही, इस बार भी खाता नहीं खोल सकी | मोदी-शाह की जोड़ी 2014 लोकसभा चुनाव के बाद से भारतीय जनता पार्टी के लिए जीत हासिल करने की गांरटी बन गई थी | देखते ही देखते देश के अधिकांश राज्यों में बीजेपी का कमल खिल गया | उत्तर से दक्षिण और पश्चिम से पूर्वोत्तर राज्यों तक बीजेपी की जीत का डंका बजने लगा और इसका श्रेय गया नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी को | लेकिन केंद्र सरकार के नाक के नीचे दिल्ली में 2015 और 2020 में दो बार चुनाव हुए | इन दोनों चुनावों में मोदी-शाह की जोड़ी केजरीवाल के सामने अपना असर नहीं दिखा सकी | ऐसे में सवाल उठता है कि बीजेपी आखिर दिल्ली का दिल क्यों नहीं जीत पाती है?





दरअसल दिल्ली की सियासत में अब तक सात बार विधानसभा चुनाव हुए और बीजेपी महज एक बार 1993 के चुनाव में जीत दर्ज करने में कामयाब रही थी | लेकिन 1998 में एक बार बीजेपी के हाथों से जो दिल्ली की सत्ता गई तो फिर आजतक वापस नहीं मिली | पहले 15 सालों में बीजेपी, कांग्रेस की शीला दीक्षित के सामने  खड़ी नहीं हो सकी और अब पिछले छह सालों से केजरीवाल के आगे पस्त नजर आ रही है | राजधानी दिल्ली में जाति और धर्म की सियासत को कभी तवज्जो नहीं दी गई है | इसके अलावा यहां के लोग नकारात्मक चुनाव प्रचार को भी अहमियत नहीं देते | क्योंकि दिल्ली में एक बड़ा तबका, कारोबारियों का है | दिल्ली के चुनाव में पार्टी से ज्यादा, नेता का व्यक्तित्व मायने रखता है | 1993 में बीजेपी ने मदन लाल खुरना को आगे कर सत्ता हासिल की थी, लेकिन सिर्फ पांच साल के दौरान बीजेपी को तीन बार सीएम बदलना पड़ा | नतीजा यह हुआ कि दिल्ली की जनता के बीच बीजेपी की तरफ से गलत राजनीतिक संदेश गया और इसका खामियाजा उसे 1998 के चुनाव में भुगतना पड़ा |

2013 में अन्ना आंदोलन से निकले अरविंद केजरीवाल ने जब आम आदमी पार्टी का गठन किया तो दिल्ली की सियासत में एक और पार्टी की एंट्री हुई. मुकाबला अब कांग्रेस-बीजेपी-AAP के बीच था | बीजेपी 31 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को सरकार बनाने के लिए समर्थन दे दिया | इस तरह बड़ी पार्टी होने के बावजूद बीजेपी दिल्ली में सत्ता के पास पहुंचते-पहुंचते रह गई | केजरीवाल 49 दिनों तक मुख्यमंत्री रहे | हालांकि 2014 लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने इस्तीफा दे दिया और इस तरह राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया | 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद 2015 में एक बार फिर से दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुआ | इस बार दिल्ली के लोगों ने केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को 67 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दिला दी | बीजेपी किसी तरह से तीन सीट बचाने में कामयाब रही |  जबकि आठ महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में सभी सातों सीटों पर बीजेपी को जीत मिली थी | हालांकि बीजेपी एक बार फिर से 2017 के दिल्ली नगर निगम चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में भारी बहुमत पाने में कामयाब रही | इसके बावजूद दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 में एक बार फिर से बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा | दिल्ली में बीजेपी की हार की वजह अरविंद केजरीवाल का सियासी कद और उनका विकास मॉडल माना जा रहा है |


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