जानिए, क्या है ट्रिपल तलाक, हलाला और खुला

medhaj news  |  India  |  21 Apr 17,16:20:17  |  
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ट्रिपल तलाक का मामला ज्श में बड़ा ही पेंचीदा मसला बन गया है। और चूंकि सभी धर्मों की तरह इस्लाम में भी काजी को कई तरह की व्याख्या की छूट धार्मिक रीति-रिवाजों के बारे में दी गई है तो ऐसे में ये मामला और भी कांप्लीकेटेड हो जाता है। फिर भी कुछ शब्द ऐसे हैं, जो तीन तलाक के मामले से जुड़े हुए हैं- हलाला, हुल्ला, मुहल्लिल और खुला।

इन्हें समझा लिया जाए तो तीन-तलाक को भी आसानी से समझा जा सकता है। सबको बारी-बारी से समझने के पहले ये जान लेना जरूरी है कि किसी भी धर्म की तरह इस्लाम में भी तलाक को किसी वैवाहिक जीवन में एक रेयर चीज माना जाता है। और जहां तक हो सके, इसे रोकने की कोशिश की जाती है।

ये है तीन तलाक का मतलब- तीन तलाक का कतई ये मतलब नहीं कि एक ही बार में तलाक, तलाक, तलाक बोल दो और रिश्ता खत्म। बजाए इसके तीन तलाक होने में 3 महीने या कुछ ज्यादा वक्त लग जाता है। अगर किसी महिला और पुरुष के रिश्ते इतने बिगड़ चुके हैं कि उनमें सुधार की कोई गुंजाइश नहीं रह गई है तो वे काजी और गवाहों के सामने पुरुष महिला को एक तलाक देता है। इसके बाद दोनों करीब 40 दिन साथ गुजारते हैं पर सेक्स नहीं करते।

इस बीच अगर उनको लगता है कि उनका फैसला गलत है या जल्दीबाजी में लिया गया है तो वे सभी को ये बात बताकर फिर से साथ रह सकते हैं। पर अगर अभी भी उनके बीच सब ठीक नहीं होता तो पुरुष उन सभी के सामने फिर दूसरा तलाक देता है और लगभग इतना ही वक्त पति-पत्नी फिर से साथ में गुजारते हैं। इस बार भी अगर दोनों के बीच सब नॉर्मल नहीं होता तो तीसरे तलाक के साथ दोनों अलग हो जाते हैं।

हलाला

हलाला, यानी ‘निकाह हलाला’, शरिया के मुताबिक अगर एक पुरुष ने औरत को तलाक दे दिया है, तो वो उसी औरत से दोबारा तबतक शादी नहीं कर सकता जब तक औरत किसी दूसरे पुरुष से शादी कर तलाक न ले ले। औरत की दूसरी शादी को निकाह हलाला कहते हैं।

पर इस प्रथा की आड़ में कई बार औरत की जबरदस्ती दूसरी शादी कर रेप करवा दिया जाता है ताकि उस औरत से फिर से पहला पति शादी कर सके। ऐसे कई मामले पिछले कुछ समय में सामने आए हैं।

तलाक के बाद लड़की अपने मायके वापस आती है और इद्दत का तीन महीना 10 दिन बिना किसी पर आदमी के सामने आए पूरा करती है। ताकि अगर वो प्रेग्नेंट हो तो जिस्मानी तौर पर सोसाइटी के सामने आ जाए।

जिससे उस औरत के ‘चरित्र’ पर कोई उंगली न उठा सके। उसके बच्चे को ‘नाजायज़’ न कह सके क्योंकि धर्म कोई भी हो, हमारे समाज में तो लड़की ही अपनी छाती से लेकर गर्भ तक परिवार की इज्जत की ठेकेदार होती है।

खैर, इद्दत का वक्त पूरा होने पर वो लड़की आज़ाद है। अब उसकी मर्ज़ी है वो चाहे किसी से भी शादी करे। आमतौर पर ये सब इतनी नाराजगी के बाद होता है कि दोबारा से उस आदमी से शादी करने की गुंजाइश ही नहीं बचती।

लेकिन अगर मर्द अब फिर से अपनी बीवी को पाना चाहे तो तब तक नहीं पा सकता जबतक उस औरत ने फॉर्मल तरीके से दूसरे मर्द से शादी (दरअसल सेक्स) न किया हो और उसके बाद उससे तलाक ले लिया हो।

दरअसल इसके पीछे कारण ये है कि जिस पिछड़ी सोच के साथ ये कानून बनाए गए थे, उनमें हमारे समाज में औरत मर्द की प्रॉपर्टी होती है, इसलिए जरूरी है कि मर्द को उसे खोने का एहसास दिलाया जाए। इसलिए एक मर्द को सजा देने के लिए औरत का नए मर्द के साथ सेक्स करना जरूरी हो जाता है। यही होता है ‘हलाला’।

पर इस्लाम में असल हलाला का मतलब ये होता है कि एक तलाकशुदा औरत अपनी आज़ाद मर्ज़ी से किसी दूसरे मर्द से शादी करे और इत्तिफाक़ से उनका भी निभा ना हो सके और वो दूसरा शोहर भी उसे तलाक दे-दे, या मर जाए, तो ही वो औरत पहले मर्द से निकाह कर सकती है।

ये असल इस्लामिक हलाला है। पर इसमें अपनी सहूलियत के हिसाब से काजी-मौलवी के साथ मिलकर लोग प्रयोग करते रहे हैं। इसी की एक उपज है- हुल्ला।

हुल्ला

वैसे तो यह आखिरी परिस्थिति किसी बड़े इत्तेफाक के चलते ही बनती है। और इस्लाम के हिसाब से भी जानबूझ कर या प्लान बना कर किसी और मर्द से शादी करना और फिर उससे सिर्फ इस लिए तलाक लेना ताकि पहले शोहर से निकाह जायज़ हो सके, यह साजिश नाजायज़ है।

पर इन सबका इंतजाम भी है क्योंकि इसका एक पहलू ये भी है कि अगर मौलवी हलाला मान ले, तो समझे हलाला हो गया। इसलिए मौलवी को मिलाकर किसी ऐसे इंसान को तय कर लिया जाता है जो निकाह के साथ ही औरत को तलाक दे देगा। इस प्रक्रिया को ही हुल्ला कहते हैं। यानी हलाला होने को ही ‘हुल्ला’ कहते हैं।

तहलीली

वो इंसान जो हुल्ला के लिए राजी होता है। उसे तहलीली कहा जाता है। ये निकाह के साथ ही औरत को तलाक दे देता है ताकि वो अपने पहले शौहर से शादी कर सके।

औरत को बस ‘खुला’ का है अधिकार

अगर सिर्फ बीवी तलाक चाहे तो उसे शौहर से तलाक मांगना होगा। क्योंकि वो खुद तलाक नहीं दे सकती। अगर शौहर तलाक मांगने के बावजूद भी तलाक नहीं देता तो बीवी शहर काज़ी (जज) के पास जाए और उससे शौहर से तलाक दिलवाने के लिए कहे।

इस्लाम ने काज़ी को यह हक़ दे रखा है कि वो उनका रिश्ता ख़त्म करने का ऐलान कर दे, जिससे उनका तलाक हो जाएगा। इसे ही ‘खुला’ कहा जाता है।

 

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