अमरीश पुरी के बर्थडे पर पढ़ें अनसुने क़िस्से

medhaj news 22 Jun 18 , 06:01:38 India
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अभिनेता अमरीश पुरी अपनी फिल्मों से आज भी अपनी उपस्थ‍िति बनाए हुए हैं | वे 22 जून 1932 को जन्मे थे | 35 साल के करियर में अमरीश ने 400 से ज्यादा फिल्में की | उन्हें ज्यादातर फिल्मों में नकारात्मक भूमिका निभाने के लिए जाना गया | उनकी जन्मतिथि पर जानिए उनके बारे में दिलचस्प बातें |

अमरीश पुरी ने 40 साल की उम्र में फिल्म करियर शुरू किया था | अपने बड़े भाई मदन पुरी का अनुसरण करते हुए फिल्मों में काम करने मुंबई पहुंचे अमरीश पहले ही स्क्रीन टेस्ट में फेल रहे और उन्होंने भारतीय जीवन बीमा निगम में नौकरी कर ली | साथ-साथ नाटककार सत्यदेव दुबे के लिखे नाटकों पर पृथ्वी थियेटर में काम करने लगे थे | रंगमंचीय प्रस्तुतियों ने उन्हें टीवी विज्ञापनों तक पहुंचाया, जहां से वह फिल्मों में खलनायक के किरदार तक पहुंचे | अमरीश पुरी को 1960 के दशक में रंगमंच को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई | उन्होंने दुबे और गिरीश कर्नार्ड के लिखे नाटकों में प्रस्तुतियां दीं | रंगमंच पर बेहतर प्रस्तुति के लिए उन्हें 1979 में संगीत नाटक अकादमी की तरफ से पुरस्कार दिया गया |

अमरीश पुरी ने 'जुरैसिक पार्क' जैसी ब्लाकबस्टर फिल्म के निर्माता स्टीवन स्पीलबर्ग की मशहूर फिल्म 'इंडियाना जोंस एंड द टेंपल ऑफ डूम' में खलनायक के रूप में मां काली के भक्त का किरदार निभाया था | स्पीलबर्ग ने जब अमरीश का काम देखा तो उन्होंने अपनी फिल्म के लिए अमरीश को अमेरिका ऑडिशन के लिए बुलाया | लेकिन अमरीश ने जवाब दिया- यदि लेना है तो मुंबई हवेली पर आ जाइये | इसके बाद भी अमरीश ने स्पीलबर्ग की फिल्म के लिए कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई | फिर जब सर रिचर्ड एटनबरो ने उन्हें कहा कि स्पीलबर्ग की फिल्में खास होती हैं तो पुरी ने वो फिल्म कर ली | वे एटनबरो के डायरेक्शन वाली ‘गांधी’ (1982) में काम कर चुके थे |

स्‍टीवन स्‍पीलबर्ग ने कहा था, 'अमरीश पुरी मेरे पंसदीदा विलेन हैं | वो दुनिया में सबसे बेहतर थे और भविष्‍य में उन जैसा कोई नहीं होगा |' प्रेम पुजारी से फिल्मों की दुनिया में कदम रखने वाले अमरीश पुरी के अभिनय से सजी कुछ मशहूर फिल्मों में निशांत, मंथन, गांधी, मंडी, हीरो, कुली, मेरी जंग, नगीना, लोहा, गंगा जमुना सरस्वती, राम लखन, दाता, त्रिदेव, जादूगर, घायल, फूल और कांटे, विश्वात्मा, दामिनी, करण अर्जुन, और कोयला आदि हैं | 1971 में फिल्म 'रेशमा और शेरा' से खलनायक के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले अमरीश पुरी इस फिल्म से दर्शकों के बीच अपनी पहचान नहीं बना सके |मशहूर बैनर बाम्बे टॉकीज में कदम रखने के बाद उन्हें बड़े बैनर की फिल्म मिलनी शुरू हुई | इसके बाद अमरीश पुरी ने खलनायकी को ही अपना कैरियर का आधार बनाया |

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