REVIEW:'धड़क' से नहीं धड़का दर्शकों का दिल, धड़क पब्लिक रिव्यु देखिये

Medhaj news 21 Jul 18 , 06:01:38 India
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सरल शब्दों में 'धड़क' मराठी की संवेदनशील और बेहद कामयाब फिल्म सैराट की ऑनर किलिंग है। समर्थ को कभी दोष नहीं लगता और पैसेवाले के सौ खून सदा माफ हैं। यहां भी मैसेज साफ है कि धनबल से आप किसी भी खूबसूरत फिल्म का कत्ल कर सकते हैं। वह भी इस उपकार के साथ कि क्षेत्रीय भाषा की फिल्म को हम हिंदी के साथ राष्ट्रीय बना रहे हैं। इस कत्ल की कोई सजा नहीं। धड़क देखने के बाद आप सैराट के लिए दो मिनिट का मौन रख सकते हैं। निर्देशक शशांक खेतान को रिलीज से पहले यह बताते में हिचक नहीं थी कि सैराट देखने और रीमेक के पहले या बाद में उन्होंने नागराज मंजुले से न मुलाकात की और न कभी बात। बेहतर होता कि वह सैराट के निर्देशक से मिलते। तब शायद जान पाते कि कहानी की आत्मा क्या है। सैराट के समाज, उसके ग्रामीण-कस्बाई वास्तविक-से किरदार, जातिगत समीकरण और कथित उच्चवर्गीय धौंस-धमक तथा हत्या को जायज बताने वाली मानसिकता को समझ पाते। तय है कि सैराट की कहानी को शशांक ने हम्टी शर्मा और बद्रीनाथ की दुल्हनिया वाले चश्मे से देखा।

फिल्म में भुजिया-नमकीन बनाने वाली कंपनी और एक ब्रांडेड पंखे पर पांच-सात मिनट लंबे दृश्य और प्रचार करने वाले संवाद हैं। इसके बाद हीरोइन को जिस चर्चित कॉल सेंटर में नौकरी मिलती है, उसका भी पंद्रह मिनट का प्रमोशन हाथों हाथ कर दिया गया। कलाकृति के हृदय में धन का धारदार चाकू उतारना भी कला है। करन जौहर इसमें माहिर हैं। उनके लिए सिनेमा बिजनेस है। उन्होंने धड़क को बिजनेस की तरह बनाया। धड़क में दर्शकों को श्रीदेवी की बेटी जाह्नवी के बहाने ही खींचा जा सकता था, तो वह उसे ले लाए। जाह्नवी के लिए फिल्म में सांत्वना यह कि वह खूबसूरत दिखी हैं। मां से तुलना न करें तो पहली फिल्म में उनसे जितना संभव था, उतना उन्होंने अभिनया। प्रेम के दृश्यों में वह अनुकूल दिखीं। 

ईशान खट्टर की यह दूसरी फिल्म है। माजिद मजीदी ने उनसे बियॉन्ड द क्लाउड्स में जो अभिनय कराया था, वह शशांक नहीं करा सके।धड़क पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा सैराट की तर्ज पर रची गई है। फर्क है तो क्लाइमेक्स में। जब सैराट का सब कुछ ले लिया तो क्यों क्लाइमेक्स नहीं अपनाया, यह आश्चर्य है। अंत बदलने से फिल्म का भला नहीं होता। ऑनर किलिंग में यहां लड़की का भाई-नातेदार उसके पति और बच्चे को ऊंची इमारत से फेंक कर मार देते हैं। अपनी बहन-बेटी को बचा लेते हैं। 

क्या राजनीतिक मुहावरे के तहत निर्देशक को कहानी में यह सही लगा? धड़क के अंत से सैराट जैसा करंट नहीं लगता क्योंकि इसका न प्रेम छूता है और इसकी राजनीतिक-सामाजिक पृष्ठभूमि। यहां उदयपुर की झीलें और महल सुंदर हैं। सैराट से तुलना न भी करें तो धड़क औसत फिल्म है, जिससे आप ठीक से टाइम भी पास नहीं कर सकते। कहानी उदयपुर के राजसी-रसूखदार-राजनीतिक परिवार की लड़की के एक साधारण लड़के के प्रेम में पड़ने और परिवार के विरोध पर उसके साथ भाग जाने के धागों से बुनी गई है।

उदयपुर, मुंबई और नागपुर होती कहानी कोलकाता जाती है। फिल्म का पहला हिस्सा निराश करता है। दूसरे हिस्से में घटनाओं का उतार-चढ़ाव है मगर अंत में फिल्म लड़खड़ा जाती है। आप सैराट देख चुके हैं तो बुरी तरह निराश होंगे और अगर वह नहीं देखी तो पहले उसे देखें। ताकि जान सकें कि क्यों धड़क उस खूबसूरत फिल्म की ऑनर किलिंग है।

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