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क्यों शहरों को छोड़ गईं गौरैया ?

Medhaj News 23 Feb 20 , 06:01:40 India
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गौरैया जिसे हम चिड़िया या चिड़ी कहते हैं क्या सच में लुप्त हो रही है? हालिया जारी एक रिपोर्ट की मानें तो ऐसा कतई नहीं है | बीते बीस पच्चीस साल में गौरैया (हाउस स्पैरो) की संख्या में कोई बड़ी गिरावट नहीं आई है | गांव कस्बों ढाणियों में यह वैसे ही चहकती फुदकती मिल जाती है बस शहरों या यूं कहें कि बड़े शहरों में अब वह कम या नहीं दिखती है | कारण कि वह शहरों को छोड़ती जा रही है | नयी दिल्ली के गुरु गोबिंद सिंह इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर (पर्यावरण) डा सुमित डूकिया के अनुसार महानगरों से गौरैया के गायब होने की वजह यही है कि हमारा शहरी ढांचा उसके अनुकूल नहीं है | वहां न तो उसके लिए घोंसले बनाने की जगह बची है और न ही उसके चुग्गे पानी की गुंजाइश |





शायद यही कारण है कि वह धीरे धीरे महानगरीय सोच में ढलती आबादी से दूर जा रही है, क्योंकि यहां उसके चहकने, फुदकने, घोंसला बनाने की गुंजाइश नहीं है | आमतौर पर बड़े बुजुर्ग कहते सुने जाते हैं कि मोबाइल फोन टावरों से निकलने वाली हानिकारिक किरणों के चलते चिड़िया सहित अनेक पक्षी शहरों से पलायन कर रहे हैं | लेकिन इस रिपोर्ट में इस प्रचलित धारणा को खारिज करते हुए कहा गया है कि मौजूदा साक्ष्यों से तो ऐसा कुछ नहीं लगता | इस रपट 'स्टेट आफ इंडियाज बर्ड 2020' में दो पक्षियों चिड़िया और मोर के बारे में जानकारी 'अच्छी खबर' शीर्षक के साथ दी गयी है क्योंकि आम धारणा के विपरीत बीते दो दशकों में इनकी संख्या घटी नहीं है | जो अच्छी बात है | रपट में गौरैया के बारे में कहा गया है - आमतौर पर यही धारणा है कि भारत में गौरैया की संख्या कम हो रही है लेकिन इस प्रजाति की संख्या में बीते 25 से ज्यादा साल में कोई गिरावट नहीं आई है | रपट के अनुसार कई वजहों से दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, बेंगलुरू और हैदराबाद जैसे महानगरों में चिड़िया की संख्या कम हो रही है | हालांकि मोबाइल टावरों से निकलने वाली हानिकारक किरणों के चलते इस चिड़िया के शहर छोड़ने की बात भी अटकल ही है क्योंकि मौजूदा साक्ष्य इसकी गवाही नहीं देते | विशेषज्ञों का कहना है कि चिड़िया के महानगरों से दूर जाने की वजह दाने चुग्गे की कमी, घोंसले बनाने की जगह नहीं मिलना और ध्वनि तथा प्रकाश प्रदूषण हो सकता है |





यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई जब गौरैया के लगातार गायब होने की चिंता जताई जा रही है | उसको बचाने के लिए अनेक अभियान शुरू किए गए हैं | कहा यही जा रहा है कि मोबाइल फोन टॉवर से निकलने वाली किरणों, कीटनाशकों के कारण गौरैया लुप्त हो रही है | दिल्ली और बिहार में घरेलू गौरैया (हाउस स्पैरो) को राजकीय पंछी घोषित किया जा चुका है और 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है | यह रपट 'स्टेट आफ इंडियाज बर्ड 2020' 17 फरवरी को गांधी नगर में जारी की गयी | भारत में पक्षी, पखेरूओं परिंदों की स्थिति पर यह अपनी तरह की पहली विस्तृत रपट है | इस रिपोर्ट में भारत में मिलने वाली पक्षियों की 1300 से अधिक प्रजातियों में से 867 का विश्लेषण किया गया है | यह रपट मोटे तौर पर 15,000 पक्षी प्रेमियों द्वारा उपलब्ध करवाई गई जानकारी पर आधारित है | इसमें कहा गया है कि पिछले लगभग 25 साल में 126 प्रजातियों में कोई कमी या बढ़ोतरी नहीं हुई | चिड़िया की बात हो रही है तो बताते चलें कि इसका वैज्ञानिक नाम पासर डोमेस्टिक है | देश के विभिन्न हिस्सों व अलग अलग भाषाओं में से इसे चिरैया, झिरकी, चिरी, चेर, चराई पाखी, घराछतिया, चकली, चिमनी, पिछुका, गुबाच्ची और कुरूवी के नाम से जाना जाता है |


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