सरकारी शिक्षा एक सवाल! वादे बदले लेकिन कितनी बदली शिक्षा?

Medhaj News 5 Oct 17,17:56:00 Special Story
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यूं तो सरकारें शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए न जाने कितनी योजाएं पेश कर देते है, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक शिक्षा का प्रसार हो। लेकिन इन स्कूलों में शिक्षा का स्तर आज भी चिंता का विषय बना हुआ है... जी हां, शिक्षा सुधार के क्षेत्र में सरकार की तरफ से अनेक प्रयास समय-समय पर किए जाते रहे है, लेकिन इनका प्रभाव बच्चों की शिक्षा में देखने पर शायद ही मिलता हो।  

ऐसा ही कुछ देखने को मिला ‘बादलपुर’ गांव के एक सरकारी स्कूल में जहां फीस बहुत ज्यादा वसूली जाती हैं, और शिक्षा का स्तर भी गिरा हुआ हैं। कोई ऐसी व्यवस्था देखने को नहीं मिलती हैं, जिससे लगे कि एक भी विद्यार्थी की शिक्षा का जिम्मा शिक्षक अपने ऊपर ले रहे हैं।

सरकारी स्कूलों में शिक्षा का माध्यम हिंदी ही रहा है... ऐसे में एक विद्यार्थी को अंग्रेजी समाज के बराबर बनाने के लिए और मेहनत की आवश्यकता है।

कुछ महत्वपूर्ण तथ्य जो हमारी सरकारी शिक्षा के लिए बहुत अनिवार्य हैं-

-अंग्रेजी शिक्षा का विस्तार।

-समय-समय पर निरीक्षण की व्यवस्था हो।

-परीक्षाओं का अच्छा स्तर।

शिक्षा बना व्यापार

सरकार द्वारा लिए फैसले के बावजूद भी कुछ स्कूल इसकी अवहेलना कर रहे है। अगर ऐसा ही रहा तो शिक्षा का निजीकरण दूर नहीं। प्राइवेट स्कूलों की बढ़ती संख्या इस बात का प्रमाण है कि धीरे-धीरे शिक्षा का निजीकरण हो रहा है। सरकार के द्वारा सरकारी स्कूलों का निर्माण भी न के बराबर ही हो रहा है, लेकिन इसकी तुलना में प्राइवेट स्कूलों का निर्माण बढ़ता जा रहा है।

शिक्षा का महत्व

हम सभी के जीवन में शिक्षा का बहुत महत्व हैं, कहते है कि शिक्षा इंसान के जीवन को और भी बेहतर भी बनाती है। शिक्षा देश के विकास में भी अपना योगदान निभाती है, एक बेहतर देश के निर्माण के लिए के हर व्यक्ति और बच्चे का शिक्षित होना आवश्यक है। जिसमें सरकार, नागरिक और शिक्षकों को मिलकर काम करने की आवश्यकता है, ताकि हर व्यक्ति इसके महत्व को समझ सके और देश के विकास में हर किसी का सहयोग हो।

शिक्षा का अधिकार

भारतीय संविधान (86वां संशोधन) अधिनियम, 2002 ने भारत के संविधान में अंत: स्‍थापित अनुच्‍छेद ‘21-क’ मौलिक अधिकार के रूप में 6 से 14 वर्ष के आयु समूह में सभी बच्‍चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करता है। शिक्षा का अधिकार सरकार द्वारा मिल तो गया है, लेकिन जागरूकता के अभाव में इसका उपयोग अभी भी सीमित है।

सुधार 

‘राइट टू एजुकेशन’ कानून 6 से 14 साल के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है। लेकिन कानून के लागू होने के बाद भी अभी काफी कमियां दिख रही हैं। 92 फीसदी स्कूल अब भी इस कानून के तहत सारे मानकों को पूरा नहीं कर रहें। 60 लाख बच्चे अब भी स्कूलों से बाहर हैं। केवल 45 फीसदी स्कूल ही हर 30 बच्चों में एक टीचर होने का अनुपात करते हैं। शिक्षा के स्तर को और भी सुधारने की जरूरत है। शिक्षा का अधिकार कानून से लंबे वक्त से जुड़े लोग कहते हैं कि सबसे बड़ी चिंता पिछड़े इलाकों में स्कूलों का बंद होना है।

‘राइट टू एजुकेशन’ फोरम के संयोजक अंबरीश कुमार के मुताबिक, “पिछले 5 साल में एक लाख से ज्यादा स्कूल बंद हुए हैं। इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है? ऐसे हालात इसलिए हो रहे हैं, क्योंकि सरकार ध्यान नहीं दे रही, उल्टे सरकार RTE के तहत बजट में कटौती कर रही है।”

अब सवाल यह उठता है कि क्या सरकार इस तरह एक बेहतर देश का निर्माण करेगी? यह सरकार की नीतियों पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है... जिसकी तरफ सरकार को ध्यान देना चाहिए। 

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