महाराणा प्रताप ऐसे योद्धा, जिनकी मौत पर उनका सबसे बड़ा शत्रु अकबर भी फूट-फूट कर रोया

मेधज न्यूज 9 May 17,16:01:07 Special Story
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वीरता के प्रतीक, महान योद्धा महाराणा प्रताप जी की जयंती है। 9 मई को महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था। उदयपुर, मेवाड में शिशोदिया राजवंश के राजा थे। उनका नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है। उन्होंने कई सालों तक मुगल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किया। महाराणा प्रताप सिंह ने मुगलो को कई बार युद्ध में भी हराया। उनका जन्म राजस्थान के कुम्भलगढ में महाराणा उदयसिंह एवं माता राणी जीवत कँवर के घर हुआ था।

आइए उनकी जयंती पर जानते हैं उनसे जुड़े कुछ रोचक तथ्य-

- महाराणा प्रताप ने अपने जीवन में कुल 11 शादियां की थी उनके पत्नियों और उनसे प्राप्त उनके पुत्रों पुत्रियों के नाम है:-

महारानी अजब्धे पंवार :- अमरसिंह और भगवानदास

अमरबाई राठौर :- नत्था

शहमति बाई हाडा :-पुरा

अलमदेबाई चौहान:- जसवंत सिंह

रत्नावती बाई परमार :-माल,गज,क्लिंगु

लखाबाई :- रायभाना

जसोबाई चौहान :-कल्याणदास

चंपाबाई जंथी :- कल्ला, सनवालदास और दुर्जन सिंह

सोलनखिनीपुर बाई :- साशा और गोपाल

फूलबाई राठौर :-चंदा और शिखा

खीचर आशाबाई :- हत्थी और राम सिंह

हल्दीघाटी का युद्ध

यह युद्ध 18 जून 1576 में मेवाड तथा मुगलों के बीच हुआ था। इस युद्ध में मेवाड की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया था। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लडने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे -हकीम खाँ सूरी।

इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह तथा आसफ खाँ ने किया। इस युद्ध का आंखों देखा वर्णन अब्दुल कादिर बदायूनीं ने किया। इस युद्ध को आसफ खाँ ने अप्रत्यक्ष रूप से जेहाद की संज्ञा दी। इस युद्ध में बींदा के झालामान ने अपने प्राणों का बलिदान करके महाराणा प्रताप के जीवन की रक्षा की।वहीं ग्वालियर नरेश 'राजा रामशाह तोमर' भी अपने तीन पुत्रों 'कुँवर शालीवाहन', 'कुँवर भवानी सिंह 'कुँवर प्रताप सिंह' और पौत्र बलभद्र सिंह एवं सैंकडों वीर तोमर राजपूत योद्धाओं समेत चिरनिद्रा में सो गया।

इतिहासकार मानते हे कि इस युद्ध में कोई विजय नहीं हुआ। पर देखा जाए तो इस युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह विजय हुए अकबर के विशाल सेना के सामने मुट्ठीभर राजपूत कितने देर तक टिक पाते पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। ये युद्ध पूरे एक दिन चला और राजपूतों ने मुग़लो के छक्के छुड़ा दिया थे ओर सबसे बड़ी बात यह है कि युद्ध आमने सामने लड़ा गया था! महाराणा कि सेना ने मुगल कि सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था ओर मुगल सेना भागने लग गयी।

1579 से 1585 तक पूर्व उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और गुजरात के मुग़ल अधिकृत प्रदेशो में विद्रोह होने लगे थे ओर महाराणा भी एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे। अतः परिणामस्वरूप अकबर उस विद्रोह को दबाने मे उल्जा रहा और मेवाड़ पर से मुगलो का दबाव कम हो गया। इस बात का लाभ उठाकर महाराणा ने साल 1585 में मेवाड़ मुक्ति प्रयत्नों को ओर भी तेज कर लिया। महाराणा की सेना ने मुगल चौकियां पर आक्रमण शुरु कर दिए और तुरंत ही उदयपूर समेत 36 महत्वपूर्ण स्थान पर फिर से महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया। महाराणा प्रताप ने जिस समय सिंहासन ग्रहण किया , उस समय जितने मेवाड़ की भूमि पर उनका अधिकार था, पूर्ण रूप से उतने ही भूमि भाग पर अब उनकी सत्ता फिर से स्थापित हो गई थी। बारह वर्ष के संघर्ष के बाद भी अकबर उसमें कोई परिवर्तन न कर सका। और इस तरह महाराणा प्रताप समय की लंबी अवधि के संघर्ष के बाद मेवाड़ को मुक्त करने मे सफल रहे और ये समय मेवाड़ के लिए एक स्वर्ण युग साबित हुआ। मेवाड़ पे लगा हुआ अकबर ग्रहण का अंत 1585 में हुआ। उसके बाद महाराणा प्रताप उनके राज्य की सुख-सुविधा मे जुट गए, परंतु दुर्भाग्य से उसके ग्यारह वर्ष के बाद ही 19 जनवरी 1597 में अपनी नई राजधानी चावंड मे उनकी मृत्यु हो गई।

महाराणा प्रताप सिंह के डर से अकबर अपनी राजधानी लहौर चला गया और महाराणा के स्वर्ग सीधरने के बाद अगरा ले आया। अकबर महाराणा प्रताप का सबसे बड़ा शत्रु था, पर उनकी मौत की खबर सुनकर अकबर रोने लगा था क्योंकि ह्रदय से वो महाराणा प्रताप के गुणों का प्रशंसक था और अकबर जनता था कि महाराणा जैसा वीर इस धरती पर कोई नहीं है।

'एक सच्चे राजपूत, शूरवीर, देशभक्त, योद्धा, मातृभूमि के रखवाले के रूप में महाराणा प्रताप दुनिया में सदैव के लिए अमर हो गए।

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