Headline

व्यंग्य -“ग्रामीण विद्युतीकरण की कहानी, टिंकू ट्रांसफार्मर की जुबानी”

Medhaj News 5 Jan 19,23:06:46 Special Story
news_poyam1.png

 ( बिजली रानी और टिंकु ट्रांसफार्मर जी 5 साल पुराने दोस्त हैं और उनकी यह दोस्ती टिंकु ट्रांसफार्मर जी की लैब में टेस्टिंग के दौरान शुरू हुई थी। आज बिजली रानी को अपने दोस्त टिंकु ट्रांसफॉर्मर की बहुत याद रही थी तो उन्होंने टिंकु ट्रांसफॉर्मर को फ़ोन किया जिसका संक्षिप्त वार्तालाप निम्नवत्त है )               



                                        



बिजली रानी: अरे ट्रांसफॉर्मर जी! कभी हमें भी बुलाइए न अपने गाँव में।



टिंकू ट्रांसफॉर्मर: अरे बिजली रानी जी! बुलाना तो हम भी चाहते हैं पर आप जिस कीमती सड़क पर चलती हैं वो तो हमारे गाँव में  अभी तक पहुँची ही नहीं है।



बिजली रानी: हम कुछ समझे नहीं भाई??



टिंकू ट्रांसफॉर्मर: अरे बिजली जी! आपको बुलाने के लिए तो पहले फीडर नाम की सड़क बनवानी पड़ेगी न, तब ही तो आपकी और हमारी मुलाकात हो पाएगी।



बिजली रानी: अच्छा! हाँ ये तो बिल्कुल सही कहा आपने। तो जल्दी से अपने गाँव के प्रधान जी से कह कर सरकार को अर्जी लगवाइये।



टिंकू ट्रांसफॉर्मर: अरे कहाँ! ये अर्जी तो प्रधान जी ने 5 साल पहले ही लगा दी थी, तब तो हम इस गाँव में आकर बसे भी नहीं थे। पर अब यहाँ आकर बहुत पछतावा हो रहा है।



बिजली रानी: वो क्यों? आप तो सकुशल लग रहे हैं?



टिंकू ट्रांसफॉर्मर: अभी तो ठीक हूँ पर जिस प्रकार कामकाज छोड़ देने पर शरीर बेकार होने लगता है, ठीक उसी प्रकार अगर हम यहाँ बिना किसी कार्य के पड़े रहे तो जंग लगने से हम तो उम्र से पहले ही बूढ़े हो जायेंगे।



बिजली रानी: हाँ कह तो आप सही रहे हैं। अच्छा अब मैं फ़ोन रखती हूँ और आशा करती हूँ कि सरकार की कृपा से हमें मिलने का अवसर शीघ्र ही प्राप्त होगा।



टिंकू ट्रांसफॉर्मर: ठीक है बिजली जी।



( इधर टिंकु ट्रांसफॉर्मर अपनी बहन बिजली रानी से बात करने के बाद मायूस हो गया और अपने आस-पास देखने लगे। तभी उसकी नज़र पास में ही लगे लंबू खंभे पर पड़ी, जो उसी कि तरह दुखी नज़र रहा था। )



                                                                                           



 



 



टिंकू ट्रांसफॉर्मर: अरे लम्बू खंभे बेटे, क्या हुआ? इतना दुखी क्यों प्रतीत हो रहे हो?



लम्बू खंभा: अब क्या बताऊँ टिंकू दादा? हम भी आपके भाँति ही लाचार खड़े हैं यहाँ पर। पूरा एक साल हो गया मुझे यहाँ लगे हुए, पर बिजली रानी को बुलाने के लिए, बिजली विभाग वाले फीडर भईया को यहाँ तक ला ही नहीं पा रहे हैं और हमारी सरकार है कि सुदृढ़ बिजली व्यवस्था के नाम पर वोट माँगने में लगी हुई है।



टिंकू ट्रांसफॉर्मर: सही कह रहे हो लम्बू । मेरी भी बिजली रानी जी से बात हुई थी। बेचारी हमसे मिलने के लिए बहुत बेचैन थी पर मन मसोस कर रह गयी।



लम्बू खंभा: हाँ दादा। जाने कब ये सरकार और बिजली विभाग नींद से जागेंगे और अपने इस गाँव को पूर्ण रूप से विद्युतीकृत करेंगे। अभी तो एक खंभा और ट्रांसफार्मर लगा कर ही रिपोर्ट में लिख देते है कि गाँव ऊर्जीकृत हो गया है।



टिंकू ट्रांसफॉर्मर: अरे नहीं लम्बू ! इस ढीली व्यवस्था के लिए सिर्फ सरकार और विभाग ही जिम्मेदार नहीं है। आम जनता का भी बराबर का दोष है।



लम्बू खंभा: आश्चर्य से.....वो कैसे दादा?



टिंकू ट्रांसफॉर्मर: अरे लम्बू ! ऐसी जनता और गाँव का भला कैसे हो सकता है जहाँ के लोगों को अपने क्षेत्र की सम्पदा और सामान की चिंता ही नहीं है।                                                                                                  



लम्बू खंभा: मतलब दादा?



टिंकू ट्रांसफॉर्मर: सुनो जब मुझे इस गाँव में लाकर बसाया गया था तब मेरी सुरक्षा के लिए मेरे चारों तरफ एक जालीनुमा दीवार बनायी गयी थी जिसे फेंसिंग कहते हैं पर ये गाँव वाले उसे भी निकाल कर ले गए। कोई कह रहा था शहर में बेच कर पैसा बना लेंगे तो कोई खिड़की और दरवाजे बनाने के सपने देख रहा था, और तो और इन लोगों ने मेरे अंदर जितनी तांबे के तारों की वाइंडिंग लगी थी उसे भी चोरी करके बेच दिया। अच्छा हुआ सरकार ने मुझमें तेल नहीं डाला था वरना ये लोग तो उसे भी लेकर चले जाते कि शायद चूल्हे पर खाना बनाने या दिया-बत्ती जलाने में ही काम आएगा। अब तो बस ये बाहरी ढांचा ही बचा है। पता नहीं बिजली जी के आने तक सलामत रह पाएगा या नहीं?



लम्बू खंभा: दादा बहुत दुःख हुआ यह सुन के। हमें भी जब यहाँ लगाया गया था तो गिरने से बचाने के लिए और मजबूती के लिए एक मोटे तार (स्टे वायर) से बांधा गया था पर बिजली रानी जी की अनुपस्थिति का फायदा उठा कर गाँव के लोग उसे भी काट के ले गए और इतने कम समय में ही मैं टेढ़ा हो गया। लगता है कि जब तक सरकार नींद से जागेगी तब तक मैं ज़मीन पर ही गिरा पड़ा मिलूँगा या फिर किन्ही खेतों के मेढ़ों पर विभाजन के लिए या तार बाँधने वाले खम्भों के रूप में काम में लाया जाऊँगा।



तभी कुछ ही दूर पर खड़ा एक राहगीर जो शायद निकट के शहर से आया था, दोनों की बातों को ध्यान से सुन रहा था। अब उससे रहा नहीं जा रहा था और वह उन दोनों को शहर में बिजली व्यवस्था से जुड़े कुछ किस्से सुनाना चाह रहा था। इसी मंशा के सा बीच में ही हस्तक्षेप करते हुए वह बोला….       



    मनमौजी इंसान: टिंकू ट्रांसफार्मर और लम्बू खंभे जी अगर आप बुरा न माने तो हम भी अपने शहर से जुड़े हुए बिजली संकटों के अनुभवों को साँझा करना चाहते हैं।





(टिंकू ट्रांसफार्मर और लम्बू खंभा दोनों ही आश्चर्य से मनमौजी इंसान को देखते हुए)



टिंकू ट्रांसफॉर्मर: क्या? शहर में भी बिजली संकट...? क्यों मज़ाक कर रहे हैं मनमौजी भईया?



मनमौजी इंसान: अरे! हम मज़ाक नहीं कर रहे हैं। शहरों में भी बिजली व्यवस्था की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। हाँ ये ज़रूर है कि बिजली गाँवों की अपेक्षा कुछ घंटे ज्यादा आती है।



लम्बू खंभा: फिर क्या समस्या है मनमौजी जी?



मनमौजी इंसान: कहने को तो बिजली 24 घंटे के लिए उपलब्ध है पर बिजली का आना औ र जाना दोनों इतनी तेजी से लगा रहता है की एक बार....



टिंकू ट्रांसफॉर्मर: एक बार क्या भईया?



मनमौजी इंसान: एक बार मेरे एक पड़ोसी सिरफिरे को दिल का दौरा पड़ गया तो उसकी पत्नी अनपढ़ी ने अपने 5 साल के मासूम बच्चे, कम-दिमाग को दवा का पर्चा थमाते हुए दवा लाने के लिए मेडिकल स्टोर भेजा और उसका इंतज़ार करने लगी।



लम्बू खंभा: फिर?



मनमौजी इंसान: फिर जब तक कम-दिमाग बेटा वापस आया तब तक सिरफिरे भाईसाहब गुजर चुके थे।



टिंकू ट्रांसफॉर्मर: अरे! ये क्या कह रहे हो भईया?? वो क्यों? उसको जल्दी आना चाहिए था न?



मनमौजी इंसान: वो क्या है न टिंकू जी, अनपढ़ी जी अपने बेटे को बोली थीं कि 'बेटा बिजली की तरह जाना और बिजली की  तरह आना।'



लम्बू खंभा: तो इसमें गलत क्या है मनमौजी जी?



मनमौजी इंसान: अरे! जब कम-दिमाग बेटा लौट के आया तो उसकी माँ ने देर से आने का कारण पूछा। तो बहुत ही मासूमियत से बेटा बोला कि 'माँ तुम ही तो कही थीं कि ‘बेटा बिजली की तरह जाना और बिजली की तरह आना' और अपने यहाँ तो बिजली एक बार जाती है तो 2-3 घंटे बाद ही आती है तो हम भी 3 घंटे बाद वापस आये।



ये बात सुन कर तो अनपढ़ी जी अपना सर पकड़ के बैठ गयी।



(टिंकू ट्रांसफार्मर और लम्बू खंभा दोनों दुखी होते हुए- 'बेचारी कह देती कि बेटा जल्दी आना')



मनमौजी इंसान: ये तो बस एक उदाहरण भर है, ऐसे सैकड़ों किस्से भरे पड़े हैं जो सरकार और बिजली विभागों की लाचार व्यवस्था कि तस्वीर पेश करते हैं।



मनमौजी इंसान की बातें सुनकर टिंकू ट्रांसफार्मर और लम्बू खंभा दोनों ही सोचते हैं कि जब सरकार को जीवित इंसानों की सुध नहीं है तो हम तो बेजान वस्तुएं हैं। यही सोच कर दोनों मुस्करा देते हैं और अपने भाग्य बदलने का इंतज़ार करने लगते हैं



-भावना मौर्य



( यह व्यंग्य मेधज टेक्नो कॉन्सेप्ट प्राइवेट लिमिटेड की 'मेधज-मंथन' पत्रिका में प्रकाशित किया गया था। कॉपीराइट आरक्षित @ मेधज ग्रुप )



 



                         


    Comments

    • Medhaj News
      Updated - 2019-01-13 14:44:19
      Commented by :Ishan Joshi

      It was funny and thoughtful at the same time.


    • Load More

    Leave a comment


    Similar Post You May Like