#ClockBack2016 : इस साल बॉलीवुड पर रहा वुमेन पावर का जलवा!

मेधज न्यूज  |  Special Story  |  29 Dec 16,11:08:45  |  
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हर साल बॉलीवुड में कई फिल्में रिलीज होती है, लेकिन अक्सर इन फिल्मों पर पुरुष प्रधान होने का ठप्पा लगा होता है। अभिनेत्रियों को रोमांस, आइटम सॉन्ग या फिर हीरो को हमदर्दी देने वाला रोल दिया जाता रहा है।

महिलाओं के मुद्दों पर बनने वाली फ़िल्में या तो आर्ट फ़िल्में हो जाती हैं या फिर उनपर 'लीक से हटकर' बनी फ़िल्म का ठप्पा लग जाता है। लेकिन धीरे धीरे यह चलन बदला है और हिंदी फ़िल्मों में नायिकाओं का उदय हुआ है। 2016 में कई महिला प्रधान फिल्में भी भारतीय सिनेमा का हिस्सा बनी।

साल 2016 में बॉलीवुड में महिलाओं की कहानियों को कहती हुई ऐसी 10 से भी ज़्यादा फ़िल्में साल रिलीज़ हुई व सभी फिल्मों को दर्शकों का बेहद प्यार मिला था।

-नीरजा

1986 में हाईजैक हुए एक विमान के यात्रियों की सुरक्षा के लिए अपनी जान दांव पर लगाने वाली एयरहोस्टेस नीरजा भनोट की ज़िंदगी पर बनी। इस फ़िल्म में दिखाया गया है कि कैसे मुश्किल परिस्थिति में भी एक लड़की अपना बिना आपा खोए प्लेन में मौजूद सभी यात्रियों की जान बचाती है, लेकिन खुद उनकी गोली का शिकार हो जाती है।

एयरहोस्टेस को लेकर एक आम सोच है कि वो बस ख़ूबसूरत होती हैं। लेकिन निर्देशक राम माधवानी की फ़िल्म ने इसी 'सोच' को तोड़ती है। एक लड़की की दास्तां दिखाती है जो खूबसूरत होने के साथ साथ साहसी भी थी।

-दंगल

23 दिंसबर को रिलीज हुई फिल्म दंगल का एक खुबसूरत डॉयलाग “म्हारी छोरियां, छोरो से कम हैं के?" इस काहनी की पटकथा को स्पष्ट करती है। यह फिल्म रीयल किरदार गीता फोगट की काहनी है, जो की भारत की एक पहलवान है।      

इस फिल्म में निर्माता आमिर ख़ान और निर्देशक नितेश तिवारी ने एक पहलवान पिता का कुश्ती जैसे 'मर्दों' के खेल में अपनी बेटियों को लाना, लड़कियों के लिए बनाई गई सामाजिक रीतियों और बंधनो को तोड़ना बड़ी ख़ुबसूरती से दिखाया गया है।

-कहानी-2

इस फिल्म में निर्माता निर्देशक सुजॉय घोष दिखाते हैं कि किस तरह 'सुरक्षित' माने जाने वाले घर में भी एक लड़की सुरक्षित महसूस नहीं कर सकती।  कैसे एक बलात्कार या शोषण से ग़ुज़रने वाली बच्ची आजीवन सामान्य होने कि कोशिश करती रहती है लेकिन हो नहीं पाती। हालांकि इस काहनी को रोचकपूर्ण बनाने के लिए कुछ चीजें नाटकीय भी की गई है।

-डियर ज़िंदगी

इस फिल्म में आप देखते है कि किस तरह एक सिनेमेटोग्राफर खुद की एक फिल्म बनाना चाहती है। जिसका साथ उसके माता-पिता भी नही देते, क्योंकि वह 9 से 5 ऑफिस नही जाती। परिवार से शादी के दबावों को झेल रही है।

इस फिल्म में एक लड़की की मनोदशा को बखूभी दिखाया है। साथ ही एक डॉक्टर जंहागीर के जरिए यह भी समझाती है कि एक लड़की का साथ मिले तो वह उड़ सकती है।

-पिंक

इस फिल्म निर्देशक अनिरूद्ध रॉय चौधरी ने यह दिखाया है कि किस तरह पुरुषवादी मानसिकता के लोग महिलाओं के हंसने-बोलने और उनके पुरुषों के साथ उठने बैठने या देर रात घर आने को आसानी से महिलाओं के चरित्र से जोड़ देते हैं।

पिंक हमारे समाज और हमारी मानसिकता में गहरी पैठ बना चुके लैंगिक भेदभाव पर करारी चोट करती है और समाज की ओर से "अच्छी महिलाओं" के लिए बना दिए गए एक खाँचे पर सवाल उठाती है।

 

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