‘जय जवान-जय किसान’ के लिए ही नहीं... इन बातों के लिए भी हमेशा याद रहेंगे श्री लाल बहादुरशास्त्री जी!

मेधज न्यूज  |  Special Story  |  11 Jan 17,11:30:39  |  
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‘जय जवान-जय किसान’ नारे को बुलंद करने वाले और सैनिकों को राष्ट्रशक्ति के रुप में मान्यता दिलाने वाले भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की आज 52वीं पुण्यतिथि है। शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर 1901 को हुआ, वहीं उनकी मौत 11 जनवरी 1966 को हुई थी।

मौत के पीछे छुपा राज अभी भी बना है रहस्य

भारत-पाकिस्तान के बीच 1965 का युद्ध ख़त्म होने के बाद 10 जनवरी 1966 को शास्त्री जी ने पाकिस्तानी सैन्य शासक जनरल अयूब ख़ान के साथ तत्कालीन सोवियत रूस के ताशकंद शहर में ऐतिहासिक शांति समझौता किया था। लेकिन अचानक ही उसी रात शास्त्री जी को कथित तौर पर दिल का दौरा पड़ गया, जिससे उनकी मौत हो गई। बताया जाता है कि समझौते के बाद लोगों ने शास्त्रीजी को अपने कमरे में बेचैनी से टहलते हुए देखा था।

बातें यह भी सामने आई थी कि जिस रात शास्त्री जी की मौत हुई, उस रात शास्त्री जी का डिनर उनके नीजि नौकर ने नहीं बनाया था। बल्कि सोवियत में भारतीय राजदूत टीएन कौल के कुक जान मोहम्मद ने बनाया था। खाने के बाद ही उनको बैचेनी होने लगी।

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शास्त्री जी की मौत के बाद उनके पार्थिव शरीर का रंग नीला पड़ गया था। देख कर ऐसा लग रहा था कि उनको खाने में जहर दिया गया है। शास्त्री जी के बेटे और पत्नी ने उनके मौत के पीछे छिपे राज की जांच करने की अपील की। उनका मानना था कि उनकी मौत प्राकृतिक नहीं थी।

बाद में बताया गया कि उनके द्वारा लिया गया ताशकंद का समझौता गलत था, उसकी वजह से उनकी आलोचना होने लगी थी। बाद में उन्हें महसूस हो गया था कि उन्होंने गलत फैसला लिया है। इसी के चलते उनको दिल का दौरा पड़ गया था।

कद छोटा-रुतबा बड़ा-

छोटे कद सहज स्वभाव के लाल बहादुर शास्त्री का रुतबा काफी बड़ा था। वह कबी अपनी गलती किसी के सामने स्वीकारने से पीछे नहीं हटते थे। कहा जाता है कि एक बार उन्हें रेलमंत्री बनाया गया था, एक ट्रेन हादसे के बाद उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया था। वह हमेशा कहते थे ‘हम चाहे रहे न रहे देश का तिरंगा झंड़ा सदा ऊंचा रहेगा।’

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बताया जाता है कि जब 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ था। तब तीनों रक्षा अंगों के प्रमुख ने उनसे पूछा था, ‘क्या किया जाए’, इस पर शास्त्री जी ने कहा, “आप देश की रक्षा कीजिए और बताइए कि हमें क्या करना है?”

इस पर भारत की विजय हुई थी और इस जीत में तत्कालीम प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का बहुत बड़ा योगदान था। 

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