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अंग्रेजी हुकूमत को दहलाने वाले महान क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त की है जयंती

नई दिल्ली: 18 नवम्बर, 1910 को बंगाल के औरी गांव के एक कायस्थ परिवार में जन्में बटुकेश्वर दत्त (Batukeshwar Dutt) देश के उन लोकप्रिय क्रांतिकारियों में से रहे है, जिनकी बहादुरी के किस्से आप सुनते आए है लेकिन आज हम भारत माता के इस लाडले के जीवन के उस पहलू को आपके सामने रखेंगे जिससे देश का एक बड़ा हिस्सा अनजान है।
बटुकेश्वर दत्त का परिवार मूलत: बंगाल का निवासी था, लेकिन उनके पिता गोष्ठ बिहारी दत्त कानपुर में नौकरी करते थे। विद्या अर्जन के उद्देश्य से कानपुर आए बटुकेश्वर दत्त ने 1924 में मैट्रिक की परीक्षा पास की और कानपुर के पी.पी.एन. कॉलेज से स्नातक पूरी की। इसी दौरान बटुकेश्वर दत्त सरदार भगतसिंह और चन्द्रशेखर आज़ाद के सम्पर्क में आए और क्रान्तिकारी संगठन ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन’के सदस्य बन गए। इसके बाद वे आजादी के रंग में ऐसे रंगे की अंग्रेजों से आंख में चोली और बम,बंदूक,गोली उनके जीवन का हिस्सा हो गए। अब तक बटुकेश्वर दत्त ने बम बनाने में महारथ हासिल कर चुके थे।
शहीद न होने का मलाल
बटुकेश्वर दत्त को उम्र भर इस बात का मलाल था कि वे अपने दोस्त भगतसिंह के साथ फांसी पर नहीं चढ़ सके। जब दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में बटुकेश्वर दत्त को भर्ती किया गया तो उनके शब्द थे-“मुझे स्वप्न में भी ख्याल न था कि मैं उस दिल्ली में जहां मैने बम डाला था, एक अपाहिज की तरह स्ट्रेचर पर लाया जाउंगा।” दत्त अब कैंसर के असहनीय दर्द से जूंझ रहे थे। लगातार उनकी गिरती सेहत को देखते हुए 11 दिसंबर को उन्हें एम्स में भर्ती कर दिया गया। भगत सिंह की मां विद्यावती से बटुकेश्वर दत्त का विशेष लगाव था। भगतसिंह के फांसी के बाद मां विद्यावती भी उन्हें अपने बेटे भगत सिंह सा ही स्नेह रखती थी। अपने जीवन के अंतिम दिनों में बटुकेश्वर दत्त ने इच्छा जाहिर कि- “मेरा दाह संस्कार मेरे मित्र भगत सिंह की समाधि के बगल में किया जाए।” 17 जुलाई 1965 को बटुकेश्वर दत्त कोमा में चले गये और 20 जुलाई 1965 की रात एक बजकर 50 मिनट पर मां भारती के इस लाल ने इस दुनिया से विदाई ले ली। उनकी इच्छानुसार ही भारत-पाक सीमा के करीब हुसैनीवाला में भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव की समाधि के निकट बटुकेश्वर दत्त का दाह संस्कार किया गया।

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