लॉकडाउन आगे बढ़ने से अर्थव्यवस्था की स्थिति और भी खराब हो सकती है

Medhaj news 6 Apr 20 , 06:01:40 Business & Economy Viewed : 5 Times
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भारत की मैक्रोइकोनॉमिक स्थिति बेहद धूमिल है और लोकल व देशव्यापी स्तर पर लॉकडाउन (Lockdown in India) जारी रहता है तो आने वाले समय में यह और भी खराब हो सकती है | जाने माने अर्थशास्त्री जीन ड्रेज़ ने रविवार को यह बात कही |  ड्रेज़ ने आगे कहा कि लॉकडाउन की वजह से देश के कई कोने में सामाजिक अस्थिरता बढ़ रही है | कोरोना वायरस महामारी (Coronavirus Pandemic) से निपटने के लिए एहतियात के तौर पर 21 दिन का लॉकडाउन किया गया है |  PTI से खास बातचीत में ड्रेज़ ने कहा - स्थित बेहद धूमिल है और आने वाले समय में यह और भी बुरी हो सकती है | अभी भी लगता है कि लोकल या राष्ट्रीय स्तर पर लॉकडाउन जारी रह सकता है | संभव है कि वैश्विक मंदी भारतीय ​अर्थव्यवस्था को बुरी तरह से प्रभावित करे | भारतीय ​अर्थव्यवस्था (Indian Economy) पर कोरोना वायरस आउटब्रेक (Coronavirus Outbreak) के इम्पैक्ट पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि रोजगार पर इसका असर पड़ेगा | कुछ सेक्टर्स बुरी तरह प्रभावित होंगे | हालांकि, संकट की इस घड़ी में मेडिकल केयर जैसे सेग्मेंट में ग्रोथ देखने को मिल सकती है | उन्होंने कहा - अधिकतर सेक्टर्स की स्थिति खराब होती है तो उनके लिए खतरा पैदा हो सकता है...यह ठीक वैसा है जैसे किसी साइकिल एक पहिया पंक्चर हो जाए तो आप उम्मीद नहीं कर सकते हैं ​वो कितनी आगे तक जाएगी | आसान शब्दों में कहें तो अगर यह संकट कुछ और समय के लिए रहता है तो अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से को प्रभावित करेगा | इसमें बैंकिंग सेक्टर भी शामिल होगा |





ड्रेज़ का कहना है कि लॉकडाउन के बाद प्रवासी मजूदर (Migrant Labours) हैं तो अपने घरों तक चल पड़ेंगे | आने वाले कुछ समय के लिए वो शहरों की तरफ बढ़ने में हिचकेंगे | उन्होंने कहा - अगर किसी के पास थोड़ी बहुत जमीन भी नहीं है तो उन्हें अपने घर पर रहकर काम करना भी मुश्किल होगा | उन्होंने आगे कहा कि कई ऐसे सेक्टर्स हैं, जो प्रवासी मजूदर पर अधिक निर्भर हैं | ऐसे में इन सेक्टर्स में मजूदरों की कमी हो सकती है | उत्तर भारत में गेहूं की फसलों की कटाई के लिए दिहाड़ी मजूदरी की कमी पर बोलते हुए उन्होंने कहा - यही इस स्थिति की विरोधाभास है | कमी और अधिकता एक साथ दिखाई दे रही है, क्योंकि सर्कुलेशन चैनल बुरी तरह से बाधित हुआ है | जब उनसे पूछा गया कि क्या यह यूनिवर्सल बेसिक इनकम (UBI) लाने के लिए मुफीद समय है, तो उन्होंने कहा कि इस चक्र को दोबारा लाने का यह समय नहीं है | इसीलिए मौजूदा योजनाओं की ही मदद लेनी जानी चाहिए | इसमें पब्लिक डिस्ट्रीब्युशन सिस्टम (PDS) और सोशल सिक्योरिटी पेंशन स्कीम्स शामिल हो सकता है | UPA सरकार के दौर में राष्ट्रीय सलाहकार समिति (National Advisory Council) के सदस्य रहने वाले ड्रेज़ ने कहा - अन्य परिपेक्ष्य में देखें तो यूबीआई संभव है उचित लग सकता है, लेकिन आज के भारत में यह एक तरह का डिस्ट्रैक्शन होगा | उल्लेखनीय है कि कई अंतर्राष्ट्रीय क्रेडिट रे​टिंग एजेंसियों ने COVID-19 की वजह आर्थिक ग्रोथ (Economic Growth) के अनुमान में कटौती की हैं | फिच रेटिंग्स के मुताबिक, वित्त वर्ष 2020-21 में GDP ग्रोथ 2 फीसदी के स्तर पर जा सकती है | पिछले 30 साल में ऐस पहली बार हो सकता है | चालू वित्त वर्ष के एशियन डेवलपमेंट बैंक भारतीय आर्थिक ग्रोथ की रफ्तार 4 फीसदी देखता है | पिछले सप्ताह ही S&P ग्लोबल रेटिंग्स ने जीडीपी ग्रोथ अनुमान को 5.2 फीसदी से घटाकर 3.5 फीसदी कर दिया है | मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने भी जीडीपी ग्रोथ के अनुमान में कटौती की है | कहा जा रहा है कोरोना वायरस महामारी की वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहरा झटका लगा है |


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