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डायरी में दिखीं सूखी पंखुड़ियाँ गुलाब की

याद आयी आज फिर किसी, अधूरे से ख्वाब की;
डायरी में जब दिखीं, सूखी पंखुड़ियाँ गुलाब की;

उनका वो आस-पास रहना,
साथ होकर भी कुछ न कहना;
अदा थी उनकी कातिलाना,
और नज़र थी, आफ़ताब सी;

उनकी आवाज की कशिश वो,
उनके व्यक्तित्व की तपिश वो;
चैन छीन लेती थीं मेरा, उनके
चेहरे पर रौनक वो, महताब सी;

ताज़ा हो गयी आज फिर यादें, उस अधूरे प्यार की;
डायरी में जब दिखीं, सूखी पंखुड़ियाँ गुलाब की।

उनके चुपके से किये इशारे,
लगते थे बहुत प्यारे;
मदहोश करने को काफी थीं,
उनकी नजरें नशीली, शराब सी;

महफ़िल में अक्सर उनका, यूँ छू कर गुजर जाना,
अनजान बन पलट कर, फिर हौले से मुस्कुराना;
शायद ये कोशिशें थीं उनके, इश्क-ए-इजहार की;
हसरत थी उधर भी, एक-दूजे के साथ की;

याद आयी आज फिर किसी बिछड़े यार की;
डायरी में जब दिखीं, सूखी पंखुड़ियाँ गुलाब की।

बड़ा अजीब था ये ये रिश्ता,
जिसमें खामोशी बेहिसाब थी;
नज़रें मिल गयीं तो मुलाकात,
और झुक गयीं तो आदाब थी;

पर रह गया सब अधूरा,
तस्वीरें दिलों में हैं, ख्वाब सीं;
न सवाल सुनने वाला है कोई,
न ही उम्मीद है, किसी जवाब की;

नैनों से बह निकले अश्रु, आज नदियों की धार सी;
डायरी में जब दिखीं, सूखी पंखुड़ियाँ गुलाब की;

याद आयी आज फिर बिछड़े दिलदार की;
डायरी में जब दिखीं, सूखी पंखुड़ियाँ गुलाब की।
★★★★
—–(Copyright@भावना मौर्य “तरंगिणी”)—-
[आफ़ताब= हीरा, महताब= चन्द्रमा का प्रकाश ]

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