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कहानी- क्योंकि तुम एक भारतीय हो (भाग-5)

अब आगे की कहानी……….

‘ऐसे क्या देख रहे हो केविन?’
डैड (अटकते हुए) ‘क्या.. क्या कहा तुमने जस्ट अभी?’
‘क्या सुना तुमने?’ माँ ने अपनी आईब्रोज़ उठाते हुए डैड को पैनी नज़र देखते हुए पूछा।
डैड (झेंपते हुए) माँ से- ‘यू सेड हस्बैंड?’
‘हम्म…तो नहीं हो क्या?’ माँ ने मुस्कुराते हुए कहा।
डैड फिर झेंपते हुए- ‘नो (माँ डैड को घूरने लगती हैं जबकि वो अच्छे से समझ रही थी कि डैड के मन में कैसे सवाल हैं?), आई मीन, हूँ…. तो क्या तुमने दूसरी शादी…?’
‘कैसे करती, तुम से जो कर चुकी थी।’
‘पर मैं तो चला गया था न तुम्हे छोड़ कर (नज़रे नीचे करते हुए)…धोखा देकर?’
‘केविन, यू नो, ये इंडिया है और तुम यहाँ के संस्कारों को जानने से पहले ही यहाँ से चले गए थे। तुमने तो मुझसे शादी मेरा जिस्म पाने के लिए की थी (डैड माँ को चौंक कर देखने लगे, मतलब शादी के समय भी माँ जानती थी कि डैड उन्हें धोखा दे रहे हैं) परन्तु मैंने तुमसे शादी अपना प्रेम पूर्ण करने के लिए की थी। ये जानते हुए भी कि तुम इस रिश्ते को शायद बीच में ही छोड़ दोगे।’ (डैड ये सब सुनकर अचंभित भी थे और शर्मिंदा भी) माँ ने अपनी बात जारी रखी- ‘केविन तुम जानते हो उन कुछ दिनों की तुम्हारी मुझे पाने के लिए की गयी कोशिशों में तुम मेरे इतने करीब आ गए थे कि मैं तुमसे प्रेम कर बैठी थी। मैं नहीं चाहती थी कि मैं जीवन भर इस मलाल में जियूँ कि मेरा प्रेम अपूर्ण रह गया। तो क्या हुआ तुम्हे मुझसे प्रेम नहीं था पर मुझे तो हो गया था। इसलिए तुम्हारे एक बार कहने पर ही मैंने शादी के लिए हाँ कह दी थी। क्योंकि मैंने तुम्हें प्रेम किया था तो पाना भी चाहती थी पर बिना विवाह के आगे बढ़ना मेरे संस्कारों और संस्कृति के खिलाफ था और देखो मेरा प्रेम तब भी पूर्ण था और अब भी पूर्ण है तभी तुम आज यहाँ हो।’
‘सुकु, तो क्या तुम्हें पता था कि मैं वापस आऊंगा? और क्या तुम आज भी मुझे अपनाना चाहती हो?’
‘पूरी तरह से तो यकीं नहीं था और मैंने कोई झूठी उम्मीद भी नहीं कि थी। तुमसे शादी करते समय ही मैंने मानसिक  तौर पर खुद को हर परिस्थिति के लिए तैयार कर लिया था। इसलिए तुम्हारा वापस आना मेरे लिए सौभाग्य कि बात है पर नहीं आते तो भी तुम्हारे नाम के सहारे ही जीवन काट लेती…इतनी हिम्मत तो है तुम्हारी सुकन्या में। लेकिन मुझे लगा कि अगर तुम कभी वापस आये तो मुझे ढूँढने के लिए सबसे पहले यहीं (बीएचयू) आओगे इसलिए मैंने इस स्थान को जीवन भर के लिए अपना लिया और यही से पीएचडी करने के बाद यहाँ के साइकोलोजी डिपार्टमेंट में बातौर प्रोफेसर वर्क करने लगी। बस तबसे ऐसे ही ज़िन्दगी चल रही है….बिना किसी उम्मीद के (कहते हुए माँ भावुक हो गयी थीं)।
‘इतना होने के बाद भी तुम मुझे अपनाना चाहती हो? शायद तुम नहीं जानती कियहाँ से जाने के बाद मैंने ….’
‘और स्त्रियों से सबंध बनाये या शायद दूसरी शादी भी कर ली। है ना?’ सुकन्या माँ ने डैड की अधूरी बात पूरी की।
डैड ने भी सुनकर हाँ में सिर हिला दिया।
‘हाँ, मैं फिर भी तुम्हें अपनी ज़िंदगी में वापस पाना चाहती हूँ और फिर तुम आज यहाँ हो तो शायद किसी उम्मीद से ही आये होगे, है ना?’ माँ एक के बाद एक झटके दिए जा रही थी डैड को।
‘नहीं सुकू, किसी उम्मीद से नहीं आया था तुम्हारे पास। जो मैंने तुम्हारे साथ किया था जब वही मेरे साथ हुआ तो मुझे एहसास हुआ कि मैंने गलती नहीं गुनाह किया था जिसकी माफी भी शायद न मिले। पर तुम्हारी याद आते ही तुम्हें देखने से खुद को रोक नहीं पा रहा था।’ डैड ने भी अटकते-अटकते अपनी बात पूरी की।
‘केविन, तुमने जो किया था वो कुछ नया नहीं था मेरे लिये और तुम्हारे देश में शायद वही रिश्ते मानें जाते हैं जहाँ सिर्फ जिस्म मिलने में सुकून ढूंढा जाता है और रिश्तें निभाने का कोई बंधन न हो। पर हम भारतीय मन के मिलन को प्राथमिकता देते हैं, विवाह को जन्मों का बंधन मानते हैं और जीवन भर किसी भी रिश्ते को शिद्दत से निभाते हैं। वैसे भी इस विवाह को मैंने अपनी इच्छा से किया था। भले ही तुमने झूठ बोला था पर मुझे सच का भान था। फिर भी मैंने तुमसे विवाह किया और इसकी वजह भी मैं तुम्हें बता चुकी हूँ।’
‘और हाँ, मुझे न तब अफसोस हुआ था तुमसे शादी करने का, न अब है।अगर तुम चाहो तो आज भी अपनी सुकन्या की जिंदगी में वापस आ सकते हो।’ माँ ने डैड से कहा, और मैं उन दोनों को समझने की कोशिश कर रहा था।
डैड की आँखे नम हो चली थी सुकन्या माँ की बातें सुनकर और शायद उन्हें अफसोस भी ही रहा था अपनी गलती का कि वो हीरा छोड़कर काँच के टुकड़ों के पीछे भाग रहे थे।
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पाठकों से: आगे क्या हुआ  यह जानने के लिए पढ़ते रहें मेधज न्यूज़ ओर लाइक करके मेरा उत्साहवर्धन करते रहें :-))
—(Copyright@भावना मौर्य “तरंगिणी”)—

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