कविता - शायद कुछ ऐसा है.....

Medhaj News 4 Aug 20 , 19:08:52 Entertainment Viewed : 2299 Times
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शायद अच्छी लगती हैं उन्हें नासमझियाँ मेरी;

बोलते हैं कम, पर महसूस होता हैं मुझे;

शायद अच्छी लगती हैं उन्हें,

अल्हड़पन में की गयी मस्तियाँ मेरी।


कभी-कभी तो ढेर सारी बातें भी,

कम ही लगती हैं समझाने के लिए;

पर कभी-कभी कुछ न भी बोलो,

तो भी वो सुन लेते हैं खामोशियाँ मेरी।


कहने को तो धीर-गम्भीर-

व्यक्तित्व है उनका;

पर शायद खुश होते हैं वो

देखकर अठखेलियाँ मेरी।


वैसे तो मीलों की दूरियों में भी,

एहसासों का रिश्ता हैं हमारा,

पर शायद कभी-कभी वो,

पाना चाहते हैं नज़दीकियाँ मेरी।


किस्से सुनाने का भी,

हुनर खूब आता हैं उन्हें;

पर कभी-कभी सुनना-

चाहते हैं वो कहानियाँ मेरी।


जानती हूँ कि उसूलों के पाबंद हैं वो,

और गलतियों से सख्त नफरत हैं उन्हें;

फिर भी नज़रअंदाज कर देते हैं;

कभी-कभी नादानियाँ मेरी।


अपनी धुन के बहुत पक्के हैं वो,

ये अच्छी तरह पता है मुझे;

पर जानती हूँ कि मांयने रखती हैं,

उनके लिए मनमर्जियाँ मेरी।


जानती हूँ कि समझदारी,

कूट-कूट कर भरी हैं उनमें;

पर फिर भी नदान बन जाते हैं,

बूझने के लिए बिना तर्क वाली पहेलियाँ मेरी।


उनका साथ और विश्वास ही,

बहुत बड़ा एहसास है मेरे लिए;

उनकी एक हँसी से ही दूर हो-

जाती हैं सारी परेशानियाँ मेरी।


उनकी खुशियाँ कितनी मायने रखती हैं मेरे लिए,

इसका अंदाज़ा उन्हें भी नहीं शायद;

कितने ही खुशियों के दरबार में लगी हैं,

उनको खुश रखने की अर्जियाँ मेरी।


अभी उन्हे कद्र नहीं है हमारी, या शायद-

वो खुलकर अपनापन जताते नहीं हैं;

पर जब हम न रहेंगे इस जहान में,

तो शायद याद करेंगे वो निशानियाँ मेरी।



----(Copyright@भावना मौर्य)----



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