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भाषा विश्वविद्यालय में नैक संशोधित मूल्यांकन पद्धति कार्यशाला का प्रथम दिन

भाषा विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा विभाग उत्तर प्रदेश के सहयोग से दो दिवसीय नैक संशोधित मूल्यांकन पद्धति विषय पर कार्यशाला का आज आरंभ हुआ। कार्यशाला के उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि के रूप में प्रो0 जी0सी0 त्रिपाठी, पूर्व अध्यक्ष उच्च शिक्षा समिति, उत्तर प्रदेश,  विशिष्ट अतिथि प्रो0 राजेश सिंह, कुलपति, गोरखपुर विश्वविद्यालय तथा नैक की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से डॉ0 वहीदुल हसन, सीनियर कम्यूनिकेशन अधिकारी तथा डॉ0 नीलेश पांडे, असिस्टेंट एडवाइजर नैक विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो एनबी सिंह एवं कार्यक्रम के संयोजिका डॉ तनु डंग उपस्थित रहे। कार्यक्रम में व्यवसाय प्रशासन विभाग के सह आचार्य, डॉ मुशीर अहमद की किताब ‘आत्म निर्भर भारत’ का विमोचन भी किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रोफेसर जीसी त्रिपाठी ने कहा कि जैसे कोई किसी भी राष्ट्र का निर्माण एक दिन में नहीं हो सकता उसी प्रकार नैक मूल्यांकन में भी छोटे छोटे परिवर्तन कर, नैक में अच्छी रैंक प्राप्त की जा सकती है। उन्होंने कहा कि इसके लिए विश्वविद्यालय से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्तर पर सकारात्मक परिवर्तन करने होंगे। उन्होंने भारतीय शिक्षा पद्धति की बात करते हुए कहा कि नैक में भारतीय दृष्टिकोण को भी सम्मिलित करना आवश्यक है।
विशिष्ट अतिथि प्रो राजेश सिंह ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि उनके विश्वविद्यालय ने नैक की उच्चतम ग्रेडिंग प्राप्त करने के लिए अलग अलग स्तर पर कई सकारात्मक परिवर्तन किए हैं। उन्होंने बताया विभिन्न मैट्रिक्स की डाटा कलेक्शन तकनीक की विस्तृत जानकारी दी। साथ ही उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय के लिए पेटेंट, सीड मनी एवं वैल्यू ए्डड पाठ्यक्रमों का बहुत महत्व है।
नैक से आए विशेषज्ञ डॉ वहीदुल हसन ने बताया कि उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों में सिर्फ़ 45 प्रतिशत का नैक मूल्यांकन हुआ है और कॉलेजों में यह संख्या मात्र 10 प्रतिशत है। इस संदर्भ में नैक द्वारा भी कई जागरूकता कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा। डॉ नीलेश पांडे ने नैक मूल्यांकन की बारीकियों पर चर्चा की।
पहले तकनीकी सत्र में रुहेलखंड विश्वविद्यालय के आईक्यूएसी निदेशक, प्रो संजय मिश्रा ने क्राइटेरिया एक के बारे में विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि नैक की तैयारी करने से पहले हमें खुद को मानसिक रूप से तैयार करना आवश्यक है। लकीर के फकीर बने रहने से काम नहीं चलेगा। फीडबैक सिस्टम के महत्त्व को समझते हुए उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में समयाकूल परिवर्तन अति आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि नैक मूल्यांकन तभी सफल हो सकता है जब विश्वविद्यालय के सभी शिक्षकों को नैक के बारे में संपूर्ण जानकारी हो।
दूसरे तकनीकी सत्र के विशेषज्ञ प्रो एके सैनी, डाइरेक्टर डेवलपमेंट तथा मेंबर सेक्रेटरी, आइक्यूएसी, इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी, दिल्ली ने दूसरे क्राइटीरिया पर चर्चा करते हुए आउटकम बेस्ड लर्निंग के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि हमें देखना होगा कि क्या हमारे विश्वविद्यालय में चल रहे सभी पाठ्यक्रम पर्याप्त है? यदि नहीं तो उनमे क्या परिवर्तन किए जा सकते हैं। शिक्षण प्रशिक्षण में आईसीटी की भूमिका पर भी उन्होंने विस्तृत चर्चा की। उन्होंने यह भी बताया कि किस प्रकार पाठ्यक्रम के ब्व्ध्च्व् तैयार किए जाने चाहिए एवं उसका मूल्यांकन कैसे किया जाना चाहिए।
तीसरे तकनीकी सत्र की विशेषज्ञ, लखनऊ विश्वविद्यालय की प्रो गीतांजलि मिश्रा ने नैक के तीसरे क्राइटीरिया के बारे में विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि नैक का उद्देश्य गुणवत्ता में सुधार करना है और इसमें स्टेकहोल्डर की अहम भूमिका है। साथ ही उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय द्वारा जो भी छोटे छोटे शोध कार्य किए जाते हैं उनका उचित डॉक्यूमेंटेशन करना आवश्यक है।
कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन कार्यक्रम की समन्वयक डॉ तनु डंग ने दिया। कार्यक्रम में मंच का संचालन डॉ दुआ नकवी ने किया।
कार्यक्रम में प्रो सौबान सईद, प्रो सैय्यद हैदर अली, कुलानुशासक डॉ नीरज शुक्ला, प्रो तनवीर खदीजा, प्रो एहतेशाम अहमद, डॉ सैयद काजिम अजगर रिजवी, डॉ स्वेता शर्मा समेत विश्वविद्यालय के सभी शिक्षक तथा भारत के अलग अलग राज्यों से 300 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।

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