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आज़ादी-?”

अधुनिकता के साये में जो खुद को आज़ाद कहते हैं,
हम उन्हें आजादी का मोहताज़ कहते हैं;
तकनीकों के बेड़ियों से जो हैं जकड़े हुये,
वो खुद को नयी सदी का सारताज़ कहते हैं;

अपनों के लिए समय नहीं है जिनके पास,
सोशल मीडिया पर वो खुद को दूसरों का हमराज़ कहते हैं;
हँसता खेलता इंसान आज़ मश़ीन बन गया है,
हम तो इस सदी को ज़िन्दों का शमशान कहते हैँ;

बचपन की मासूमियत जाने कहाँ खो गयी,
अपनी परछायी भी अब अज़नबी सी हो गयी;
खेलने की उम्र में ही खो दिया बचपना,
प्रतियोगिताओं की दौड़ में रो दिया बचपना;
और ऐसी झूठी सुख-सुविधाओं से भरे इस ज़ीवन को,
जाने कैसे लोग आसान कहते हैं ?

आये दिन लड़कियों और माहिलाओं पर हो रहे हैं आत्याचार,
दूषित मानसिकताओं का हो रहा है जम कर व्यापार;
पश्चिमी (पश्चात्या सभ्यता) आँधियों से हिल रहा है अपना आधार,
फिर कैसे हम अपने मुल्क को आज़ाद कहते हैं..
फिर कैसे हम अपने मुल्क को आज़ाद कहते हैं?

आज़ादी के मायनें उन पंक्षियों से पूछों,
पिंजड़े में पूरी ज़िन्दगी बिता देते हैं जो;
अपनी सरज़मी की रक्षा की खातिर,
खुद को देश की मिट्टी में मिला देते हैं जो;
अपनी रूह को फना कर देश के हित में,
हमें बँधनों में जकडे़ होने का एहसास करा देते हैं वो;

आज़ादी का मतलब सिर्फ मुक्ती-बंधन ही नही है,
ये है छोटी-छोटी चीजों में देश का योगदान करना;
सरहद पर लड़ने से सिर्फ जंग नहीं जीत सकते,
जीत तो है अपने संस्कारों का सम्मान करना।

*🇮🇳”जय हिन्द, जय भारत”🇮🇳*
*🇮🇳बन्दे मातराम्🇮🇳*

☆☆☆☆☆☆

—(Copyright@भावना मौर्या “तरंगिणी”)—

Read more…बहुत मुश्किल होता है

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