मनोरंजनकवितायें और कहानियाँ

तेरे जज़्बातों में वज़ूद मेरा

ओ, अपनी ख़ामोशी में ही,
ज़ज्बातों को पनाह देने वाले;
तेरे जज़्बातों में मेरा भी,
वज़ूद कहीं ठहरता है क्या?

देखती हूँ मैं ज्वार-भाटा,
तेरे आँखों के समुंदर में;
तू भी कभी मेरे दिल की,
गहराइयों में उतरता है क्या?

खुद को समेटते हुए भी,
हर रोज़ बिखर जाती हूँ मैं;
तू भी किसी आवेग में,
मेरी ही तरह बिखरता है क्या?

तुझे देख लेने भर से ही,
जीने की चाह बढ़ जाती है मेरी;
तेरा भी मन मुझे पाने को,
कभी तरसता है क्या?

तेरे वास्ते खुद को हर बार,
उबार लेती हूँ भँवर से मैं;
तू भी मेरे वास्ते कभी-कभी,
गिरते हुए संभलता है क्या?

मैंने माना कि तेरी मौजूदगी,
मेरे हर एहसास पर भारी है;
मेरी मौजूदगी से भी तेरे ज़हन पर ,
कुछ असर पड़ता है क्या?

खिल जाती हूँ मैं फूलों सी,
तेरी एक झलक मिल जाने से ही;
मेरी नज़रों के ताप से तुझमें भी,
कहीं कुछ पिघलता है क्या?

सँवर रही हूँ मैं हर दिन,
तुझे पाने की उम्मीदों में;
मुझे अपना बनाने की चाहत में,
तेरा मन भी कभी निखरता है क्या?
★★★★★

—(Copyright@भावना मौर्य “तरंगिणी”)—

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