गूगल ने कैफी आजमी के 101 जन्मदिन पर बनाया खास डूडल, आइये जानते है इनके बारे में

Medhaj News 14 Jan 20 , 06:01:40 India Viewed : 12 Times
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मशहूर कवि और गीतकार कैफी आजमी की आज 101वीं जयंती है। इस मौके पर गूगल ने उन्हें विशेष सम्मान देते हुए उनका डूडल बनाया है। गूगल का पेज खुलते ही कैफी आजमी की तस्वीर नजर आ रही है । इस डूडल को कैफी आजमी की बेटी शबाना आजमी ने सोशल मीडिया पर शेयर भी किया है। कैफी आजमी ने कविताओं के अलावा बॉलीवुड गीत और कुछ फिल्मों की कहानियां भी लिखीं।





कैफी 20वीं सदी के प्रसिद्ध कवियों में से एक थे। कैफी आजमी का जन्म उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ में हुआ था। उनके पिता जमींदार थे। कैफी आजमी का असली नाम सैयद अतहर हुसैन रिजवी था। उन्होंने अपनी पहली कविता 11 साल की उम्र में लिखी थी और तभी से मुशायरों में भाग लेना शुरू कर दिया था। कैफी आजमी 1942 में हुए महात्मा गांधी के भारत छोड़ा आंदोलन से काफी प्रेरित थे।

हिंदी फिल्म जगत के मशहूर शायर और गीतकार कैफी आजमी की शेरो-शायरी की प्रतिभा बचपन के दिनो से ही दिखाई देने लगी थी।  प्रेम की कविताओं से लेकर बॉलीवुड गीतों और पटकथाएं लिखने में माहिर कैफी आजमी 20वीं सदी के सबसे प्रसिद्ध कवियों में से एक थे। उत्तर प्रदेश में आजमगढ़ जिले के मिजवां गांव में 14 जनवरी 1919 को जन्मे सैयद अतहर हुसैन रिजवी उर्फ कैफी आजमी ने अपनी पहली कविता महज 11 साल की उम्र में लिख दी थी। कैफी आजमी उस वक्त 1942 में हुए महात्मा गांधी के भारत छोड़ा आंदोलन से प्रेरित थे और बाद में उर्दू अखबार में लिखने के लिए वह मुंबई चले गए।

कैफी आजमी को फिल्म इंडस्ट्री में उर्दू साहित्य को बढ़ावा देने के लिए भी जाना जाता है। पाकीज़ा के साउंडट्रैक 'चलते चलते', फिल्म अर्थ से 'कोइ ये कैसी बताए', 'ये दुनिया ये महफिल' और उनकी अपनी कविता 'औरत' जैसी प्रसिद्ध रचनाएं उर्दू भाषा और हिंदी भाषा में उल्लेखनीय योगदान के रूप में याद की जाती हैं। कैफी आजमी बाद में को कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। उन्हें 3 फिल्मफेयर अवार्ड, साहित्य और शिक्षा के लिए प्रतिष्ठित पद्म श्री पुरस्कार भी मिल चुका है।

उत्तर प्रदेश में आजमगढ़ जिले के मिजवां गांव में 14 जनवरी 1919 को जन्मे सैयद अतहर हुसैन रिजवी उर्फ कैफी आजमी के पिता जमींदार थे। पिता हुसैन उन्हें ऊंची से ऊंची तालीम देना चाहते थे और इसी उद्वेश्य से उन्होंने उनका दाखिला लखनउ के प्रसिद्ध सेमिनरी सुल्तान उल मदारिस में कराया था। कैफी आजमी के अंदर का शायर बचपन से जिंदा था। महज 11 वर्ष की उम्र से हीं कैफी आजमी ने मुशायरों मे हिस्सा लेना शुरू कर दिया था जहां उन्हें काफी दाद भी मिला करती थी।





इनका शादी का किस्सा भी कुछ अजीब है। उनकी पत्नी शौकत आजमी ने उन्हें भरी महफिल में 'बद्तमीज' कहा था। दरअसल, कैफी आजमी हैदराबाद में एक मुशायरे में अपनी नज्म 'उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे' सुना रहे थे। इस नज्म की पहली लाइन 'उठ' शौकत आजमी की पसंद नहीं आई। उन्होंने कहा कि ये किस तरह के शायर है जिसे तमीज से बात तक करना नहीं आता है। 'उठ' की जगह 'उठिये' नहीं कह सकते थे। उन्होंने यह तक कहा कि इसे तो अदब के बारे में कुछ नहीं आता। कौन इसके साथ उठकर जाने को तैयार होगा? लेकिज जब शौकत ने उनकी पूरी ​नज्म सुनी तो वह चुप रह गई थीं।  इस नज्म का असर यह हुआ कि बाद में वही लड़की जिसे कैफी साहाब के 'उठ मेरी जान' कहने से आपत्ति थी वह उनकी पत्नी शौकत आजमी बनी।



 


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