राज्यउत्तर प्रदेश / यूपी

भारत की संस्कृति तथा संस्कृत भाषा एक दूसरे के पूरक

भारत की संस्कृति संस्कृत भाषा से सुशोभित तथा संवर्धित है। हमारी संस्कृति तथा संस्कृत भाषा एक दूसरे के पूरक हैं। संस्कृति के संरक्षण के लिए संस्कृत की आवश्यकता है। संस्कृत के पुनरुत्थान में राज्य सरकार निरन्तर कार्य कर रही है। इसके पुनरुत्थान से देश विश्वगुरू बनेगा। यह उद्गार अन्तर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, गोमती नगर लखनऊ में गुरु पूर्णिमा के उपलक्ष्य में उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान द्वारा आयोजित सेवानिवृत्त संस्कृत शिक्षकों के सम्मान कार्यक्रम में मुख्य अतिथि जितेन्द्र कुमार कार्यकारी अध्यक्ष/अपर मुख्य सचिव भाषा विभाग ने व्यक्त किए।

इस अवसर पर निदेशक, उ0प्र0 संस्कृत संस्थान विनय श्रीवास्तव ने कहा कि संस्कृत भाषा, भाषाओं की जननी के रूप में जानी जाती है। जब भारत विश्वगुरु था तब भारत की भाषा संस्कृत थी। जब दुनिया के पास ऑक्सफोर्ड, हावर्ड विश्वविद्यालय नहीं था, तब सभी विषयों के अध्ययन-अध्यापन में हमारा देश सबसे आगे था। तब की भाषा संस्कृत थी। धीरे-धीरे संस्कृत उपेक्षित होती चली गयी। उन्होंने गुरुओं से आह्वान किया कि उस समय का जो वैदिक गणित, खगोल शास्त्र, शल्य चिकित्सा है, उसे सामने लाने की जरूरत है। इसके लिए आप जैसे गुरुओं की जरूरत है। इधर संस्कृत की ओर रूझान बढ़ा है।

इस कार्यक्रम में अतिथि के रूप में आमंत्रित सुरेन्द्र कुमार पाठक, प्रो0 अयोध्या दास बैष्णों जी एवं डॉ0 पद्मिनी नातू जी ने अपने विचार रखे।

कार्यक्रम में प्रदेश के 18 मंडलों से आये 100 से अधिक सेवानिवृत्त संस्कृत अध्यापकों को मुख्य अतिथि जितेन्द्र कुमार कार्यकारी अध्यक्ष/अपर मुख्य सचिव भाषा विभाग, उ0प्र0 शासन एवं संस्थान के निदेशक विनय श्रीवास्तव अतिथियों को सम्मानित किया।

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