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जानिए छठा मंगला गौरी व्रत , जानें व्रत कथा, पूजा विधि और महत्व के बारे मे

छठे मंगला गौरी व्रत की पूजा सुबह जल्दी उठकर स्नान करके शुरू की जाती है, फिर, एक साफ कपड़ा पहनकर, महिलाएं एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाती हैं और उस पर मां गौरी की मूर्ति या तस्वीर रखती हैं। मां गौरी की पूजा के लिए व्रत का संकल्प लिया जाता है और आटे से बने दीपक को जलाया जाता है. धूप, दीप, नैवेद्य, फल-फूल आदि से मां गौरी की पूजा की जाती है. पूजा समाप्त होने पर मां गौरी की आरती की जाती है और सुख-समृद्धि की प्रार्थना की जाती है।

Mangala Gauri Vrat Medhaj Newsपूजा विधि-

सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें।
एक लकड़ी की चौकी पर लाल रंग का कपड़ा बिछाएं और उस पर मां गौरी की मूर्ति या तस्वीर रखें।
मां गौरी की पूजा के लिए व्रत का संकल्प लें।
आटे से बने दीपक को जलाएं।
धूप, दीप, नैवेद्य, फल-फूल आदि से मां गौरी की पूजा करें।
पूजा समाप्त होने पर मां गौरी की आरती करें और सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।

महत्व-

सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए यह व्रत करती हैं।
कुंवारी कन्याएं भी शीघ्र विवाह की कामना के साथ इस व्रत को करती हैं।
इस व्रत से कुंडली में मंगल दोष दूर होता है।
यदि किसी दंपति के जीवन में समस्याएं हैं, तो उन्हें इस व्रत का पालन करना चाहिए, क्योंकि इससे उनकी समस्याएं दूर हो सकती हैं।

Mangala Gauri Vrat Medhaj Newsकथा-

पौराणिक कथा के अनुसार, एक धर्मपाल नामक सेठ थे जिनकी संतान नहीं थी. वे महादेव और पार्वती की भक्ति करते थे. उनकी पत्नी ने उन्हें प्रेरित किया कि वे व्रत करके देवी मां की कृपा प्राप्त करें. उन्होंने मंगला गौरी व्रत किया और उनकी पत्नी को पुत्र की प्राप्ति हुई, लेकिन उस पुत्र की आयु बहुत कम थी। उन्होंने ज्योतिष की सलाह पर अपने पुत्र की शादी मंगला गौरी के व्रत करने वाली कन्या से की, जिससे पुत्र को मृत्यु पाश से मुक्ति मिली।

इस तरह से, मंगला गौरी व्रत विशेषकर महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण और प्राचीन परंपरा है, जिससे वे अपनी परिवार और सुख-समृद्धि की कामनाएं पूरी कर सकती हैं।

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