मनोरंजनकवितायें और कहानियाँ

निगाहों की भाषा

मेरी खूबसूरती नहीं, बल्कि निगाहों की
ख़ामोशी को तवज़्ज़ो अदा कीजिये,

जब अधरों से कहा जाये, तब ही समझे,
तो, ये तो अपनेपन का मज़ाक हुआ न,

इसलिए कभी-कभी अनकहे जज़्बातों को,
समझ कर ही अपनापन जता दीजिये,

आप कहते हैं कि भावनाओं का सैलाब हूँ मैं,
तो इस सैलाब में कभी खुद को बहा दीजिये,

किसी को दिखाने को इश्क नहीं किया जाता,
इसलिए बिना दिखावे के ही इश्क़ निभा दीजिये,

सिर्फ रुमानियत ही इश्क में ज़रूरी तो नहीं है,
कभी-कभी रूहानियत को भी इसमें जगह दीजिये,

इश्क की राहों में दिल गुमराह करता है अक्सर,
इसलिए इन गलियों में अंतर्मन से फैसला कीजिये,

अधरों से सब बया करना मुमकिन तो नहीं है,
कभी-कभी निगाहों की भाषा भी पढ़ा कीजिये।
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—-(Copyright@भावना मौर्य “तरंगिणी”)—-

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