मनोरंजनकवितायें और कहानियाँ

चल चले वहाँ…

चल चले वहाँ...

चल चले वहाँ…

चल चले वहाँ,
जहाँ गम न हो,
आँखे किसी की भी,
जहाँ नम न हों,
मन का मिलन,
जहाँ होता हो,
जहाँ ‘मैं’ न हो,
जहाँ ‘तुम’ न हो,
जहाँ ‘हम’ में,
सारी बातें हों,
रिश्तों में कोई,
अहम न हो।

चल चले वहाँ…

चल चले वहाँ,
जहाँ सब अपने हों,
जाति-धर्म का,
बंधन न हो,
सीरत की कद्र,
जहाँ होती हो,
सूरत का कोई,
वर्णन न हो।
वास्तविकता में,
लोग जीते हों,
काल्पनिकता का,
कोई प्रचलन न हो।

चल चले वहाँ…

चल चले वहाँ,
जहाँ सब हर्षित हों,
कभी दुःख से,
सजल नयन न हों;
जहाँ बस प्रेम ही-
प्रेम पनपता हो,
नफरत का कोई,
मंजर न हो,
जो दिल में हो,
वही लब बोलें,
मन में कोई छिपा,
खंजर न हो।

चल चले वहाँ…

चल चलें वहाँ,
जहाँ मनमीत मिले,
जहाँ हर पल रौशन हो मेरा,
अकेलेपन का तम न हो,
जहाँ ज्यादा पाने,
की चाह न हो,
पर जीवन जीने,
को भी कम न हो,
जहाँ अंत से भी नव,
आरम्भ होता हो,
और मृत्यु से भी,
जीवन खत्म न हो।

चल चले वहाँ…

☆☆☆☆☆☆

—(Copyright@भावना मौर्या “तरंगिणी”)—

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