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#Durgamati : फिल्म की समीक्षा With Medhajnews

Medhaj News 15 Dec 20 , 11:44:19 Movies Review Viewed : 1210 Times
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दुर्गामति की कहानी, स्क्रीनप्ले और निर्देशन की तिहरी जिम्मेदारी अशोक ने निभाई है, और इस भार को उठाने में वे लड़खड़ा गए हैं। फिल्म का प्लॉट अच्छा है, लेकिन इस पर खड़ी स्क्रीनप्ले और निर्देशन की इमारत इतनी कमजोर है कि फिल्म भरभरा कर गिर गई है। स्क्रीनप्ले राइटर और निर्देशक की यह जवाबदारी होती है कि वे फिल्म को विश्वसनीय बनाए ताकि दर्शक जो स्क्रीन पर घट रहा है उस पर यकीन करें, लेकिन यह काम अशोक ठीक से नहीं कर पाए।

कहानी है चंचल चौहान (भूमि पेडणेकर) की, जो एक आईएएस ऑफिसर थी और अपने प्रेमी शक्ति (करण कपाड़िया) की हत्या के जुर्म में जेल में बंद है। वह ईश्वर प्रसाद (अरशद वारसी) नामक मंत्री की सेक्रेटरी थी। ईश्वर प्रसाद बेहद ईमानदार मंत्री है। ईश्वर के विरोधी उसकी छवि बिगाड़ने की जवाबदारी सीबीआई ऑफिसर सत्कशी गांगुली (माही गिल) को सौंपते हैं। सत्कशी को लगता है कि यदि चंचल, ईश्वर प्रसाद की कुछ कमजोरी बता दे तो उसका काम आसान हो सकता है। वह चंचल को रानी दुर्गामती की भूतहा हवेली में पूछताछ के लिए बुलाती है, लेकिन वहां पर चंचल पर दुर्गामती के भूत का साया पड़ जाता है।

कहानी में हॉरर, रहस्य, रोमांच, कॉमेडी जैसे कई तत्व डाले गए हैं और यह तमिल-तेलुगु फिल्म 'भागमती' का हिंदी रीमेक है। दक्षिण भारतीय फिल्मकारों के साथ दिक्कत यह होती है कि वह हिंदी भाषी दर्शकों के लिए भी लाउड फिल्में बना देते हैं, जो यहां के दर्शकों को पसंद नहीं आती। कुछ दिनों पहले रिलीज 'लक्ष्मी' में हम यह देख चुके हैं और 'भानुमति' भी इसी बात का शिकार नजर आती है।

स्क्रीनप्ले की कमियां फिल्म की शुरुआत से ही उभर कर सामने आती हैं। ईश्वर प्रसाद की छवि को खराब करने के लिए इतना लंबा रास्ता क्यों चुना गया? आखिर कैसे एक आईएएस ऑफिसर को इस तरह पूछताछ के लिए निर्जन हवेली पर ले जाया जा सकता है? इस भूतहा हवेली को लेकर भी कई प्रश्न दर्शकों के दिमाग में पैदा होते हैं।

इस हॉरर-रहस्य वाली फिल्म में कॉमेडी की कोई जरूरत नहीं है, लेकिन निर्देशक अशोक बाज नहीं आए। कॉमेडी भी इतनी बचकानी कि बच्चों को भी हंसी नहीं आए। रहस्य का ताना-बाना अच्छी तरह बुना गया है, लेकिन इसे खूब लंबा खींचा गया है।

चंचल ने अपने प्रेमी को क्यों मारा? दुर्गामति के भूत का क्या राज है? इन बातों से जब परदा उठता है तो सिवाय निराशा के कुछ हाथ नहीं लगता। जो तर्क दिए गए हैं उस पर शायद ही कोई विश्वास करे क्योंकि किसी भी व्यक्ति के लिए यह सब कर पाना असंभव है, जो चंचल ने किया।

अशोक लेखक से भी ज्यादा बुरे निर्देशक साबित हुए। वे फिल्म से दर्शकों को जोड़ पाने में बुरी तरह असफल रहे। किरदारों को भी विश्वसनीय नहीं बना सके। फिल्म में मनोरंजन का भी अभाव नजर आता है।

भूमि पेडणेकर का अभिनय बढ़िया है। वे जितना फिल्म की बेहतरी के लिए कर सकती थीं उन्होंने किया। अरशद वारसी का अभिनय औसत के आसपास रहा। माही गिल और जीशु सेनगुप्ता निराश करते हैं। करण कपाड़िया सहित सपोर्टिंग कास्ट का अभिनय ठीक है।

कुल मिलाकर दुर्गामति एक बचकानी मूवी है और कोई भी प्रभाव नहीं छोड़ पाती।


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