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कासगंज के सोरों सूकर क्षेत्र की पौराणिक एवं रहस्यमयी हरपदी गंगा

कासगंज जनपद मुख्यालय से लगभग 16 किलोमीटर दूर प्रसिद्ध तीर्थ स्थल सोरों सूकर क्षेत्र में हरपदी गंगा नामक जल कुण्ड स्थित है। सोरों तीर्थ स्थल का अत्यन्त धार्मिक महत्व है और विशेष रूप से मानसून के समय कांवड़ियां यहां हरपदी गंगा का जल लेने आते हैं। साथ ही, देश के विभिन्न कोनों से लोग हरपदी गंगा में अस्थि विसर्जन के लिए आते हैं। यह मान्यता है कि इस पौराणिक कुंड में प्रवाहित करने पर अस्थियाँ जल में विलीन हो जाती हैं।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्री वाराह (भगवान विष्णु का अवतार) ने इस स्थान से स्वर्ग प्राप्त किया (शरीर का त्याग) था। इसके परिणामस्वरूप इस क्षेत्र में अस्थि विसर्जन की प्रथा एक पारंपरिक रीति बन गई है, जिससे सोरों सूकर को मोक्ष प्रदान करने वाला पवित्र स्थल माना जाता है।

प्राचीन पौराणिक कथाओं के अनुसार बलवान दैत्य हिरण्याक्ष ने देवताओं को परास्त कर दिया एवं देवलोक का अधिपति बन गया। त्रस्त देवता उसके भय से छिप गये तथा भगवान विष्णु की आराधना करने लगे। इस पर भगवान विष्णु ने वाराह रूप धारण किया तथा शूकर क्षेत्र में ब्रह्माजी की नासिका से प्रकट हुए। वाराह भगवान ने पाताल में जाकर दानव से युद्ध कर उसका वध किया। अपने अवतार के उद्देश्य को पूरा करने के बाद भगवान विष्णु ने सोरों शूकर पुण्य क्षेत्र में अपने शरीर का त्याग किया। इस स्थान पर भगवान विष्णु के वाराह अवतार की स्मृति में एक मंदिर समर्पित है।

सोरों की हरपदी गंगा का महत्व पितृ पक्ष में और भी अधिक बढ़ जाता है। मान्यता है कि हरपदी गंगा में मोक्ष की धारा अविरल रूप से बहती है, जिससे अस्थियाँ 72 घंटों में जल में विलीन हो जाती हैं। इसको समझने के लिए कई शोध किए गए हैं, लेकिन इसका रहस्य अब तक अज्ञात है। वराह पुराण में हरपदी गंगा के जल में अस्थियाँ विलीन होने का वर्णन किया गया है।

मोक्षदा एकादशी के अवसर पर, सोरों तीर्थनगरी के हरपदी गंगा के किनारे भक्तों की भीड़ उमड़ती है। सूर्योदय से पहले ही स्नान आरंभ होता है, और श्रद्धालु हरपदी गंगा के पवित्र जल में स्नान करते हैं। गंगा मैया और वराह भगवान की महिमा की स्तुति तथा जय-जयकार से वातावरण गुंजायमान हो जाता है।

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