होम > विशेष खबर

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 80% भारतीयों के 'जहरीला' पानी पीने की संभावना

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 80% भारतीयों के 'जहरीला' पानी पीने की संभावना

देश के कई निवासियों के लिए भूजल प्रमुख जल आपूर्ति स्रोत है। लेकिन घटती पर्यावरणीय परिस्थितियों के कारण होने वाले जलवायु परिवर्तन ने मानवता को त्रस्त कर दिया है जिसका प्रभाव भूजल तक पहुंच गया है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने राज्यसभा को सूचित किया है कि भूजल तेजी से घट रहा है।

भारत सरकार ने उपस्थित भूजल की मात्रा और उसकी स्वच्छता के आंकड़े प्रस्तुत किये हैं जो देश में पीने के पानी के भविष्य के लिए एक बड़ा लाल झंडा है। आंकड़े न केवल भारत में पीने के पानी के भविष्य की बात करते हैं, बल्कि यह भी कहते हैं कि हम लंबे समय से 'जहरीला' पानी पी रहे हैं। प्रस्तुत आंकड़ों में कहा गया है कि देश के लगभग सभी राज्यों के अधिकांश जिलों में भूजल में जहरीली धातुओं की अधिक मात्रा पाई गई।

 सरकार द्वारा प्रस्तुत आंकड़े -

  • 25 राज्यों के 209 जिलों के कुछ हिस्सों में भूजल में आर्सेनिक की मात्रा 0.01 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक है।
  • 29 राज्यों के 491 जिलों के कुछ हिस्सों में भूजल में आयरन की मात्रा 1 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक है।
  • 11 राज्यों के 29 जिलों के कुछ हिस्सों में भूजल में कैडमियम की मात्रा 0.003 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक पाई गई है।
  • 16 राज्यों के 62 जिलों के कुछ हिस्सों में भूजल में क्रोमियम की मात्रा 0.05 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक है।
  • 18 राज्यों में 152 जिले ऐसे हैं जहां भूजल में 0.03 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक यूरेनियम पाया गया है।

 'जहरीले' पानी के संपर्क में कौन आता है?

जल शक्ति मंत्रालय के एक दस्तावेज के अनुसार देश की 80 फीसदी से ज्यादा आबादी को जमीन से पानी मिलता है। यदि भूजल में खतरनाक धातुओं की मात्रा निर्धारित मानक से अधिक हो जाए तो इसका मतलब है कि पानी 'जहर' बन रहा है।

राज्यसभा में सरकार ने रिहायशी इलाकों की संख्या भी बताई है जहां पीने के पानी के स्रोत प्रदूषित हो गए हैं. इसके अनुसार 671 क्षेत्र फ्लोराइड से, 814 क्षेत्र आर्सेनिक से, 14,079 क्षेत्र लोहे से, 9,930 क्षेत्र लवणता से, 517 क्षेत्र नाइट्रेट से और 111 क्षेत्र भारी धातुओं से प्रभावित हैं।

समस्या शहरों की तुलना में गांवों में अधिक गंभीर है, क्योंकि भारत की आधी से अधिक आबादी गांवों में रहती है। यहां पीने के पानी के मुख्य स्रोत हैंडपंप, कुएं, नदियां या तालाब हैं। यहां पानी सीधे जमीन से आता है। इसके अलावा गांवों में आमतौर पर इस पानी को साफ करने का कोई तरीका नहीं है। इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग जहरीला पानी पीने को मजबूर हैं।

 जहरीला पानी हमें कैसे प्रभावित करता है?

सरकारी दस्तावेजों के अनुसार स्वस्थ रहने के लिए रोजाना कम से कम 2 लीटर पानी पीना चाहिए। यानी अगर आप रोजाना 2 लीटर पानी भी पी रहे हैं तो भी आपके शरीर में कुछ मात्रा में जहर जा रहा है।

 भूजल में आर्सेनिक, लोहा, सीसा, कैडमियम, क्रोमियम और यूरेनियम की मात्रा निर्धारित मानक से अधिक होने का सीधा असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है।

 

  • आर्सेनिक की अधिकता यानी त्वचा रोगों और कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
  • आयरन की अधिकता का मतलब तंत्रिका तंत्र से संबंधित बीमारियां जैसे अल्जाइमर और पार्किंसन हो सकता है।
  • पानी में लेड की अधिक मात्रा हमारे नर्वस सिस्टम को प्रभावित कर सकती है।
  • कैडमियम के उच्च स्तर से किडनी की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
  • क्रोमियम की अधिक मात्रा से छोटी आंत में डिफ्यूज हाइपरप्लासिया हो सकता है, जिससे ट्यूमर का खतरा बढ़ जाता है।
  • पीने के पानी में यूरेनियम की अधिक मात्रा से किडनी की बीमारियों और कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।

 सरकार के निवारक उपाय

केंद्र सरकार ने बताया कि दूषित पानी का मामला राज्य का विषय है और लोगों को पीने का पानी उपलब्ध कराना राज्यों की जिम्मेदारी है। केंद्र सरकार ने आगे बताया कि स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के लिए वे कई योजनाएं भी चला रहे हैं।

21 जुलाई को केंद्र सरकार ने लोकसभा को बताया था कि अगस्त 2019 में शुरू किया गया जल जीवन मिशन यह सुनिश्चित करेगा कि 2024 तक हर ग्रामीण परिवार को नल के माध्यम से पीने का पानी मिले।

उन्होंने आगे बताया कि देश के 19.15 करोड़ ग्रामीण परिवारों में से अब तक 9.81 करोड़ घरों में नल के पानी की आपूर्ति की जा रही है।

इसके अलावा केंद्र सरकार द्वारा अक्टूबर 2021 में अमृत 2.0 योजना शुरू की गई है। इसके तहत अगले 5 साल यानी 2026 तक सभी शहरों में नल के पानी की आपूर्ति करने का लक्ष्य रखा गया है।