अल्फा से अधिक खतरनाक है डेल्टा वेरिएंट - अरोड़ा

अल्फा से अधिक खतरनाक है डेल्टा वेरिएंट - अरोड़ा

कोरोना वायरस संक्रमण का डेल्टा वेरिएंट से संक्रमण बहुत फैल रहा है। ये अल्फा वेरिएंट से 40-60% अधिक संक्रामक है। इस वेरिएंट का असर अब तक अमेरिका, सिंगापुर, ब्रिटेन में होने लगा है। 


हाल ही में हुए एक साक्षात्कार में इंडियन सार्स कोव 2 जेनोमिक्स कॉन्सॉर्टियम के सह अध्यक्ष डॉ. एन के अरोड़ा ने वैरिएंट की जांच और उसके व्यवहार के हवाले से मानक संचालन प्रक्रिया के बारे में बात करते हुए ये बात कही।


नेशनल टेक्निकल एडवाइजरी ग्रुप ऑन इम्यूनाइजेशन (National technical Advisory group on immunisation) (एनटीएजीआई) के कोविड-19 वर्किंग ग्रुप के प्रमुख एन के अरोड़ा ने कहा कि यह म्यूटेशन स्पाइक प्रोटीन से बना है, जो उसे एसीई2 रिसेप्टर से चिपकने में मदद करता है। एसीआई2 रिसेप्टर कोशिकाओं की सतह पर मौजूद होता है, जिनसे यह मजबूती से चिपक जाता है। इसके कारण यह ज्यादा संक्रामक हो जाता है और शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को चकमा देने में सफल हो जाता है।


उन्होंने कहा कि ऐसे अध्ययन हैं, जो बताते हैं कि इस वेरिएंट में ऐसे कुछ म्यूटेशन हैं, जो संक्रमित कोशिका को अन्य कोशिकाओं से मिलाकर बीमार कोशिकाओं की तादाद बढ़ जाते हैं। इसके अलावा जब ये मानव कोशिका में घुसपैठ करते हैं, तो बहुत तेजी से अपनी संख्या बढ़ाने लगते हैं। इसका सबसे घातक प्रभाव फेफड़ों पर पड़ता है। बहरहाल, यह कहना मुश्किल है कि डेल्टा वेरिएंट से पैदा होने वाली बीमारी ज्यादा घातक होती है। भारत में दूसरी लहर के दौरान होने वाली मौतें और किस आयु वर्ग में ज्यादा मौतें हुईं, ये सब पहली लहर से मिलता-जुलता ही है।


कोविड-19 के बी.1.617.2 को डेल्टा वेरिएंट कहा जाता है। इसका पहला मामला भारत में अक्टूबर 2020 में सामने आया था। हमारे देश में दूसरी लहर के लिए यही प्रमुख रूप से जिम्मेदार है। आज नए कोविड-19 के 80% मामले मामले इसी वेरिएंट की देन हैं। यह महाराष्ट्र में उभरा और वहां से घूमता हुआ पश्चिमी राज्यों से होता हुआ उत्तर की ओर बढ़ा। फिर देश के मध्य भाग में और पूर्वोत्तर राज्यों में फैल गया।


वायरस ने आबादी के उस हिस्से को संक्रमित करना शुरू किया है, जो हिस्सा सबसे जोखिम वाला है। संक्रमितों के संपर्क में आने वालों को भी वह पकड़ता है। आबादी के एक बड़े हिस्से को संक्रमित करने के बाद वह कम होने लगता है और जब संक्रमण के बाद पैदा होने वाली रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम होने लगती है, तो वह फिर वार करता है। अगर नए और ज्यादा संक्रमण फैलाने वाले वेरिएंट पैदा हुए, तो मामले बढ़ सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो अगली लहर उस वायरस वैरिएंट की वजह से आयेगी, जिसके सामने आबादी का अच्छा-खासा हिस्सा ज्यादा कमजोर साबित होगा।


अरोड़ा ने कहा कि दूसरी लहर अभी चल रही है। ज्यादा से ज्यादा लोगों को टीके लगे, लोग कड़ाई से कोविड उपयुक्त व्यवहार करें और जब तक हमारी आबादी के एक बड़े हिस्से को टीके न लग जायें, हम सावधान रहें, तो भावी लहर को नियंत्रित किया जा सकता है और उसे टाला जा सकता है। लोगों को कोविड-19 के खिलाफ टीके और कोविड उपयुक्त व्यवहार पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।


डेल्टा प्लस वैरिएंट - एवाई.1 और एवाई.2 - अब तक 11 राज्यों में 55-60 मामलों में देखा गया है। इन राज्यों में महाराष्ट्र, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश समेत अन्य राज्य शामिल हैं। एवाई.1 नेपाल, पुर्तगाल, स्विट्जरलैंड, पोलैंड, जापान जैसे देशों में भी मिला है। इसके बरक्स एवाई.2 कम मिलता है। वेरिएंट की संक्रामकता, घातकता और वैक्सीन को चकमा देने की क्षमता आदि का अध्ययन चल रहा है।


यह पूछे जाने पर कि क्या टीके डेल्टा वेरिएंट के खिलाफ प्रभावी हैं, अरोड़ा ने कहा, हां, इस मुद्दे पर आईसीएमआर के अध्ययन के अनुसार मौजूदा वैक्सीन डेल्टा वेरिएंट के खिलाफ कारगर हैं।


देश के तमाम भागों में मामलों में गिरावट दर्ज की जा रही है, लेकिन कुछ हिस्सों में आज भी पॉजिटिविटी दर ऊंची है, खासतौर से देश के पूर्वोत्तर क्षेत्रों और दक्षिणी राज्यों के कई जिलों में। इनमें से ज्यादातर मामले डेल्टा वेरिएंट के कारण हो सकते हैं।


ज्यादा गंभीर तौर पर बीमार करने वाले वेरिएंट के उभरने पर कड़ी नजर रखने की जरूरत थी। उसके फैलाव को भी बराबर देखना था, ताकि बड़े इलाके में उसके फैलाव को पहले ही रोका जा सके। आईएनएसएसीओजी को दिसंबर 2020 में गठित किया गया था, जो उस समय दस प्रयोगशालाओं का संघ था। हाल में 18 और प्रयोगशालाएं उससे जुड़ गए हैं।


सार्स-कोव-2 की जिनोम आधारित पड़ताल करने के लिये प्रयोगशालाओं के मजबूत तंत्र की जरूरत महसूस की गई, ताकि उनके जरिए जीनोम सीक्वेंसिंग के सारे आंकड़ों का रोग और महामारी वाले आंकड़ों के साथ मिलान किया जाए तथा देखा जाए कि वेरिएंट-विशेष कितना संक्रामक है, उससे बीमारी कितनी गंभीर होती है, वह शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को चकमा दे सकता है या नहीं या टीके लगवाने के बाद उसे दोबारा संक्रमण हो सकता है या नहीं ।


राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) फिर इन आंकड़ों का विश्लेषण करता है। पूरे देश को भौगोलिक क्षेत्रों में बांटा गया है और हर प्रयोगशाला को किसी न किसी विशेष क्षेत्र की जिम्मेदारी दी गई है। उन्होंने कहा, हमने 180-190 क्लस्टर बनाएं हैं और हर क्लस्टर में चार-चार जिलों को रखा है। हम औचक रूप से नमूनों की जांच करते रहते हैं। साथ ही गंभीर रूप से बीमार, टीका लगवाने के बाद संक्रमित लोगों के नमूनों की भी जांच करते हैं।


इसके अलावा लक्षण रहित लोगों के नमूनों को भी देखा जाता है। इन सब नमूनों को जमा करके उनकी सीक्वेंसिंग करने के लिये इलाके की प्रयोगशाला में भेज दिया जाता है। इस समय देश में हर महीने 50 हजार से अधिक नमूनों की सीक्वेंसिंग करने की क्षमता है। पहले हमारे पास लगभग 30 हजार नमूनों को हर महीने जांचने की ही क्षमता था।


भारत के पास बीमारियों पर नजर रखने के एक मजबूत प्रणाली मौजूद है, जो इंटीग्रेटेड डिजीज सवेर्लांस प्रोग्राम (आईडीएसपी) के तहत काम करती है। आईडीएसपी नमूनों को जमा करने और उन्हें जिलों/निगरानी स्थलों से क्षेत्रीय जिनोम सीक्वेंसिंग प्रयोगशालाओं (आरजीएसएल) तक पहुंचाने का समन्वय करता है।


आरजीएसएल की जिम्मेदारी है कि वह जीनोम सीक्वेंसिंग करे, गंभीर रूप से बीमार करने वाले (वैरिएंट ऑफ कंसर्न - वीओसी) या किसी विशेष वैरिएंट (वैरियंट ऑफ इंटरेस्ट - वीओआई) की पड़ताल करे और म्यूटेशन पर नजर रखे। वीओसी/वीओआई की सूचना सीधे केंद्रीय निगरानी इकाई को दी जाती है, ताकि राज्य के निगरानी अधिकारियों के साथ रोग-महामारी के आपसी सम्बंध पर समन्वय बनाया जा सके, ताकि उन्हें मालूम हो सके कि यह रोग या महामारी कितनी भीषण है। उसके बाद नमूनों को बायो-बैंकों में भेज दिया जाता है।


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