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जोजिला पर किया था महान भारतीय सेना ने कुछ ऐसा की, पाकिस्तान को पड़ा भागना

जोजिला पर किया था महान भारतीय सेना ने कुछ ऐसा की, पाकिस्तान को पड़ा भागना

श्रीनगर से करीब 100 किलोमीटर दूरजोजिला दर्रा लद्दाख और कश्मीर घाटी के बीच की कड़ी है, 11575 की ऊंचाई पर स्थित है। गिलगित और स्कार्दू से हर मौसम में लेह और करगिल तक पहुंचा जा सकता था। सर्दियों में जोजिला पास बंद होने के साथ लेह और श्रीनगर का संपर्क कट जाता। 

आजादी के बाद से पाकिस्तान की कश्मीर पर बुरी नज़र है और वह गोरीला युद्ध से इसको हड़पना चाहता था पाकिस्तान ने कश्मीर पर कब्जे की नीयत से घुसपैठ की। नवंबर, 1947 को गिलगित पर पाकिस्तान का झंडा लहरा रहा था। जिससे पाकिस्तानी लड़ाकों का हौसला बढ़ा और उन्होंने कश्मीर हड़पने कि सोची । मई 1948 आते-आते करगिल और द्रास पर भी पाकिस्तान का  कब्ज़ा हो चूका था , अगस्त  आते आते, स्कार्दू भी पाकिस्तान के कब्जे में चला गया। पाकिस्तान की गुरिल्ला फौज अब जोजिला पास पर मौजूद थी। 11,500 फीट से ज्यादा की ऊंचाई पर मौजूद जोजिला पास एक तरह से लेह का दरवाजा है। सर्दियों में जोजिला बंद होने के साथ लेह और श्रीनगर का संपर्क कट जाता हैं ।

पूरा कश्मीर पाकिस्तान के हाथ में जाता दिख रहा था। अब बारी  थी महान भारतीय सेना कि । हालात मुश्किल थे, पर भारतीय सेना ने अपने पराक्रम से बाजी पलटना जानती थी और हुआ भी वही । 

 मार्च 1948 में पाकिस्तान कि फ़ौज ने  लेह को उत्तर और दक्षिण, दोनों तरफ से घेर लिया था।  तब भारतीय सेना ने  लेह में मौजूट टुकड़ी को पास में ही एक एयरस्ट्रिप तैयार करने को कहा गया। मई 1948 आते-आते सेना ने यह काम पूरा कर लिया।

जब पाकिस्तानी लड़ाके खालत्से के पास पहुंचने लगे तो मोर्चे पर मौजूद भारतीय सैनिको ने ब्रिज उड़ा दिया। उस वक्त तक लेह तक लॉजिस्टिक सपोर्ट पहुंचाने की कोई व्यवस्था नहीं थी। दुश्मन जोजिला, द्रास और करगिल में बैठा था। श्रीनगर से लेह का रास्ता ब्लॉक था। जनरल केएस थिमाया ने इन तीनों जगहों को खाली कराने का फैसला किया। सितंबर 1948 में ब्रिगेडियर केएल अटल की टुकड़ी को जोजिला पास खाली कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई।

 इस मिशन को 'ऑपरेशन बाइसन' नाम दिया गया। जोजिला पास वापस लेने निकली ब्रिगेड में जाट, गोरखा, मराठा लाइट इन्फैंट्री की यूनिट्स शामिल थीं।  दुश्मन की पोजिशन बेहद मजबूत थी। आर्टिलरी सपोर्ट के बावजूद आगे बढ़ना नामुमकिन साबित हो रहा था। दो कोशिश नाकाम हो चुकी थी। दुश्मन को पीछे खदेड़ने के लिए जनरल थिमाया ने टैंक  भेजने का फैसला किया। जो ११५०० मीटर कि उचाई पर था  जंहा इंसान का पहुंचना आसान नहीं था वंहा टैंक पहुंचेगा पाकिस्तान ने नहीं सोचा था। पूरी दुनिया में इतनी ऊंचाई पर टैंक कभी नहीं तैनात किए गए थे। प्लान था कि दुश्मन को पहले जोजिला से खदेड़ा जाए फिर द्रास और करगिल की ओर कूच किया जाए।

महीने भर के भीतर आर्मी इंजिनियर्स (मद्रास सैपर्स) ने वो ट्रैक तैयार कर लिया जिसके जरिए स्टुअर्ट टैंक्स बालटाल बेस से जोजिला पास तक पहुंच सकते थे। पीर पांजाल रेंज में अखनूर पर मौजूद स्क्वाड्रन की भी मदद ली गई। सेना के अनुसार, 1948 में जम्मू-श्रीनगर रोड धूल-धूसरित थी। बीच में पड़ने वाले झरनों और नदियों पर लकड़ी के कमजोर पुल थे। सेना को हर बार इंजिनियरों की मदद चाहिए थी।

टैंकों के मूवमेंट को सीक्रेट रखना था इसलिए उनकी नली निकाल दी गईं। अंधेरे में भारी पर्दे के बीच टैंक आगे बढ़े। कई पुलों से गुजरने के लिए अतिरिक्त औजर लगे। सेना के अनुसार, करीब महीने भर में टैंक श्रीनगर के पास पहुंच गए। कर्फ्यू लगा दिया गया ताकि टैंकों का मूवमेंट सीक्रेट रहे। इस बीच, अक्टूबर को बर्फ गिरने लगी तो ऑपरेशन बाइसन रोकना पड़ा।

1 नवंबर 1948 की दोपहर 2.40 बजे तक टैंक घुमरी बेसिन तक पहुंच चुके थे। उनके साथ थी गोरखा की  टुकड़ी थी। जिसमे 1 पटियाला और 4 राजपूत जो पाकिस्तानियों को उनके ठिकानों से निकाल-निकाल कर मारने लगे । इतनी ऊंचाई पर टैंक देखकर दुश्मन के होश उड़ गए। 

माइनस 20 डिग्री तापमान था, बर्फीले तूफान के बीच दुश्मन की पोजिशंस पर टैंक से हमला करना, वह भी बिना प्रॉपर क्लोदिंग और इक्विपमेंट के... दुनिया में कोई सेना इससे पहले ऐसा नहीं कर सकी थी। भारतीय सेना इसमें सफल रही।  नवंबर तक सेना जोजिला पास से सिर्फ 18 किलोमीटर दूर रह गई थी। आगे ऊंचाई पर दुश्मन मौजूद था। एक बार फिर टैंकों की मदद से उन्हें खदेड़ा गया। 15-16 नवंबर तक सेना द्रास पर कब्जा कर चुकी थी। 17-18 नवंबर को सेना ने करगिल की तरफ कूच किया। 22-23 नवंबर तक करगिल के रास्ते में मौजूद हर दुश्मन का सफाया कर दिया गया।

सेना के अनुसार, 5 गोरखा की एक कंपनी ने 4000 मीटर से ज्यादा ऊंची पहाड़ी चढ़ी। और उसी दिन, लेह से निकली टुकड़ी ने करगिल में लिंक-अप पूरा किया। लेह से श्रीनगर के बीच से दुश्मन का सफाया हो चुका था।

इसलिए कहता हूँ दोस्तों , महान  भारतीय सेना को सदैव कहो -जय हिन्द