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ये होता, तो शायद पुलवामा अटैक ना होता

ये होता, तो शायद पुलवामा अटैक ना होता

पुलवामा जिसमे 40 से ज्यादा  सैनिक शहीद हुए , केवल सैनिक ही नहीं एक बस में  सैनिक का परिवार भी था ,वह  भी काल के गाल में समा गया। इसकी  जिम्मेदार  एक तरह से सरकार हैं, जिसने  टेक्निकल सपोर्ट डिवीज़न जिसे शार्ट में टीएसडी को खत्म किया , खतम ऐसे ही नहीं किया अपितु इल्जाम  लगा कर किया , की  यह  टीएसडी नेताओ के फ़ोन सुनती है आदि आदि ।  

इस यूनिट को सेना के बहादुर अफसर कर्नल हनी बख्शी लीड कर रहे थे।  यह यूनिट भारत ने हुए 26/11 मुंबई हमले  बाद बनाई गई थी ,कर्नल हनी बख्शी और उनकी यूनिट ने  भारत में काफी कुछ बदलकर रख दिया था। संसद पर हमले के बाद मुंबई  को छलनी करने की पाकिस्तानी साजिश नाकाम कर दी गई थी, वार्ना देश में और बड़ा हादसा होता लेकिन देश को  खुफिया मोर्चे पर ज्यादा गंभीर पहल की जरूरत महसूस हुई । जल्द ही एक खुफिया यूनिट तैयार की गई  जिसका नाम था टेक्निकल सपोर्ट डिवीज़न।  लेकिन  दो साल के भीतर ही इसे बंद करना पड़ा। सेना की एजेंसी पर जमकर सियासत हुई। उस यूनिट को लीड करने वाले अफसर पर गंभीर आरोप लगे। कोर्ट मार्शल की कार्यवाही भी शुरू हो गई लेकिन सच तो सच है । सारे आरोप बेबुनियाद पाए गए, सेना के बहादुर अफसर कर्नल हनी बख्शी बेदाग निकले।  अगर  यह यूनिट जिन्दा होती तो पुलवामा हमला कभी न होता , इसी यूनिट ने  ७  आई इ  डी बिस्फोटक एक्सपर्ट आतंकवादी   में से ६ को जहन्नुम भेज दिया था। 

यह एजेंसी मुंबई हमले के मास्टरमाइंड और लश्कर के सरगना हाफिज सईद को ढूंढ रही थी। इसके लिए वह पाकिस्तान में एक गुप्त ऑपरेशन भी शुरू कर चुकी थी। इसके जरिए हाफिद सईद के करीब पहुंचने ही वाले थे।  लेकिन देश में इस पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया। विवाद हुआ या खड़ा किया गया यह सोचनीय बात है। 

इस खुफिया एजेंसी को लेकर कई विवादित दावे किए गए। आरोप लगा कि TSD का इस्तेमाल रक्षा मंत्रालय पर नजर रखने, जम्मू-कश्मीर की निर्वाचित सरकार गिराने की साजिश रचने समेत कई मामलों में किया जा रहा था। मुंबई हमले के बाद जिस खुफिया यूनिट पर सेना के सीनियर अधिकारी राजी थे, वह दागदार की जा चुकी थी। 2012 की शुरुआत में खबर सामने आई कि TSD की अत्याधुनिक तकनीक से लैस वैन खड़ी कर कैबिनेट मंत्रियों के घर के बाहर से फोन सुनने की कोशिश हो रही है।

TSD के गठन से पहले मनमोहन सिंह की सरकार के तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी से लिखित में स्वीकृति ली गई थी। इसका मकसद स्पष्ट था भारतीय सेना की गुप्त ऑपरेशन करने की क्षमता विकसित करना जिससे आतंकियों के हमले से पहले ही जरूरी ऐक्शन लिया जा सके। यह एक covert unit थी मतलब जो जनता के सामने कभी न आती। सेना के एक अधिकारी ने बताया था कि TSD कभी दावा नहीं करती कि बड़े आतंकी संगठन के लीडर को पकड़ा गया है या उसे भारत लाया जा रहा है, न ही ये बताती कि वह आतंकी सरगना को पकड़ने के करीब है। 

इस यूनिट ने छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश के नक्सलियों को पूर्वोत्तर के उग्रवादियों से हथियारों और गोला -बारूद की सप्लाई बंद करा दी थी , यह यूनिट मौसाद की तरह दुश्मन देश में घुसकर आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन के लिए तैयार थी।  काश  तसद होती तो आज पुलवामा के अमर शहीद जिन्दा होते-जय हिन्द।