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सादगी भरा व्यक्तित्व, साफ-सुथरी छवि वाले लाल बहादुर शास्त्री के बारे में, ये बात नहीं जानते होंगे आप

सादगी भरा व्यक्तित्व, साफ-सुथरी छवि वाले लाल बहादुर शास्त्री के बारे में, ये बात नहीं जानते होंगे आप

छोटा कद, साफ-सुथरी छवि और सादगी भरा व्यक्तित्व। लाल बहादुर शास्त्री को जब भी हम याद करते हैं हमारे जहन में यह तस्वीर सहसा ही सामने आ जाती है। शास्त्री डेढ़ साल तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। वह देश के दूसरे प्रधानमंत्री थे।  ११ जनबरी  1966 को  ताशकंद में उनका निधन हुआ था ।  उनकी मृत्यु  कैसे हुए यह एक रहस्य है। अपने  छोटे से कार्यकाल में लाल बहादुर शास्त्री ने जो शोहरत और सम्मान हासिल किया, वह अपने-आप में काबिले तारीफ था। उनसे जुड़े काफी किस्से आज भी मशहूर हैं। चाहे वह पीएम बनने के बाद तीन मूर्ति भवन में न रहने का फैसला हो, पीएम रहने के बावजूद दुकानदार से सस्ती साड़ी की मांग या ट्रेन के कूलर को निकलवाने का आदेश हो ।

पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के निधन के बाद पीएम की रेस में दो लोगों का नाम सबसे आगे चल रहा था। एक थे मोरारजी देसाई और दूसरे थे लाल बहादुर शास्त्री। यहां गौर करने वाली बात यह है कि नेहरू अपने अंतिम दिनों में बहुत हद तक लाल बहादुर शास्त्री पर निर्भर थे। उन पर नेहरू खुलकर भरोसा करते थे। वहीं दूसरी ओर मोरारजी देसाई पीएम की दौड़ में आगे तो थे, लेकिन ज्यादातर नेता मोरारजी देसाई को एक विवादास्पद नेता मानते थे । देसाई की आक्रामक छवि और मनमर्जी से फैसले लेने की आदत पर नेताओं को आपत्ति थी। जिसके बाद जिस नाम पर सबकी आम सहमति बनी वो थे लाल बहादुर शास्त्री। नेहरू के निधन के बाद इस पद पर बैठना शास्त्री के लिए आसान नहीं था। नेहरू का कद हर कोई मैच नहीं कर सकता था। लेकिन लाल बहादुर शास्त्री ने पीएम रहते हुए इस खालीपन को भरने में कोई कमी नहीं आने दी।

 शास्त्री जी किसी भी सूरत में तीन मूर्ति भवन में रहने के पक्ष में नहीं थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद तीन मूर्ति भवन लालबहादुर शास्त्री को आवंटित हुआ, लेकिन उन्होंने वहां शिफ्ट करने से मना कर दिया था। शास्त्रीजी तीन मूर्ति में मोटे तौर पर दो कारणों के चलते जाने के लिए तैयार नहीं थे। पहला, शास्त्री जी का तर्क था कि वे जिस पृष्ठभूमि से आते हैं, उसे देखते हुए उनका तीन मूर्ति में रहना ठीक नहीं रहेगा। दूसरा, वे तीन मूर्ति भवन में इस आधार पर भी जाने के लिए राज़ी नहीं हुए क्योंकि वे मानते थे कि देश तीन मूर्ति भवन को नेहरू जी से भावनात्मक रूप से जोड़कर देखता है। इसलिए वहां पर उनका कोई स्मारक बने।

एक बार र शास्त्री जी अपनी पत्नी के लिए साड़ी खरीदने एक दुकान में गए। एक प्रधानमंत्री को अपनी दुकान पर देखकर दुकानदार काफी खुश हुआ। शास्त्री जी ने कहा कि उन्हें 5-6 साड़ियां चाहिए। दुकानदार तुरंत एक से बढ़कर एक साड़ियां दिखाने लगा। साड़ियां काफी महंगी थी। शास्त्री जी ने दुकानदार से सस्ती साड़ियां दिखाने को कहा। साड़ीवाले ने कहा कि आप पधारे यह तो मेरा सौभाग्य है। लेकिन शास्त्री जी ने कहा कि मैं दाम देकर साड़ियां ले जाउंगा। सो जितना कह रहा हूं उसपर ध्यान दो और सस्ती साड़ियां दिखाओ। दुकानदार ने प्रधानमंत्री की बात मानते हुए सस्ती साड़ियां दिखाईं, जिसके बाद शास्त्री जी ने कीमत अदा की और वहां से चले गए।

यह उस समय की बात है जब शास्त्री जी रेल मंत्री के पद पर थे। एक दिन अचानक उन्हें किसी काम से मुंबई जाना पड़ा। ट्रेन में उनकी टिकट फर्स्ट क्लास में बुक की गई थी। पहले तो शास्त्री जी बैठ गए लेकिन उन्हें सफर के दौरान ठंडी लगने लगी। जबकि बाहर गर्म हवाएं और लू चल रही थी। शास्त्री जी बोले कि अंदर ठंडक है लेकिन बाहर काफी गर्मी है। उनके पीए कैलाश बाबू ने कहा कि आपकी सुविधा के लिए कूलर लगवाया है। इतना सुनते ही शास्त्री जी ने अपने पीए कैलाश बाबू की तरफ देखकर पूछा कि तुमने कूलर लगवाया और मुझे बताया भी नहीं। और लोगों को गर्मी नहीं लगती क्या? पीएम शास्त्री जी ने कहा कि आगे गाड़ी रुकने पर कूलर निकलवा देना। तब मथुरा स्टेशन पर गाड़ी रुकते ही सबसे पहले कूलर निकलवा दिया गया। ऐसे थे, लाल बहादुर शास्त्री ।