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आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी एवं आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री की पावन स्मृति पर संगोष्ठी का आयोजन

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी एवं आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री की पावन स्मृति पर संगोष्ठी का आयोजन

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, महाकवि सुमित्रानन्दन पंत एवं आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री की पावन स्मृति पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। डॉ0 सदानन्दप्रसाद गुप्त, कार्यकारी अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की अध्यक्षता में आयोजित संगोष्ठी में सम्माननीय अतिथि डा0 प्रेमशंकर त्रिपाठी, कोलकाता डॉ0 कलानाथ मिश्र, पटना एवं डॉ0 आनन्द कुमार सिंह, भोपाल ने व्याख्यान दिया।

अभ्यागतों का स्वागत करते हुए पवन कुमार, निदेशक, उ0प्र0 हिन्दी संस्थान ने कहा कि उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा आचर्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, महाकवि सुमित्रानन्दन पंत और आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री की पावन स्मृति को समर्पित इस संगोष्ठी में पधारें सभी विद्वानों का उ0प्र0 हिन्दी संस्थान परिवार स्वागत एवं अभिनन्दन करता है। 

हिन्दी साहित्य में छायावाद के नाम से प्रसिद्ध काल खण्ड के प्रमुख हस्ताक्षर सुमित्रानन्दपंत की जयंती है उन्हें प्रकृति के सुकुमार कवि के रूप में स्मरण किया जाता है। इसी क्रम में भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के विद्वान आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री का भी जन्म दिवस मई माह में मनाया जाता है।

डॉ0 कलानाथ मिश्र ने कहा-आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी सच्चे अर्थों संगोष्ठी में महावीर थे। वे भाषा वैज्ञानिक, समाज सुधारक, युगप्रर्वतक चिन्तक सम्पादक, आलोचक थे। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी नव जागरण तथा राष्ट्रीय एकता के लिए समर्पित थे, उनकी रचनाओं में इसकी व्यापक झलक मिलती हैं। वे कहते थे कि ज्ञान का विकास विवेकपूर्ण चिन्तन से ही हो सकता है, वाणी को परिभाषित किये जाने की आवश्यकता पर बल देते थे। उनका कहना था कि जो समर्थ होते हुए भी साहित्य की सेवा व अभिवृद्धि नहीं करता है, उसे समाज विरोधी की संज्ञा देते थे। वे आध्यात्मिकता से भी काफी प्रभावित रहे। सरस्वती पत्रिका का सम्पादन करके साहित्यिक क्षेत्र में पथ पदर्शक के रूप में जाने जाते हैं, भाषा विज्ञान के क्षेत्र में उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा है। वे अनुवादक के रूप में साहित्यिक परिदृश्य पर अमिट छाप छोड़ गये हैं। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी साहित्य के क्षेत्र में युग पुरुष के रूप में जाने जाते है। ‘प्रिय प्रवास‘ उनकी चर्चित व महत्वपूर्ण रचनाओं में है। उन्होंने खड़ी बोली में भी काफी कार्य किया। 
 
डॉ0 आनन्द कुमार सिंह ने कहा- पंत को मिश्र बंधुओं ने कहा था कि सुमित्रानन्दन पंत साहित्यिक मापदण्डों को पूर्ण करते हुए महाकवि की संज्ञा प्रदान की थी। सुमित्रानन्दन पंत ने खड़ी बोली के स्वर को बदल दिया। सुमित्रानन्दन पंत के काव्य में पल्लव, उच्छ्वास महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं। अज्ञेय ने कहा था कि पंत से भावी रचनाकार पीढ़ी सीखने का कार्य करेगी। पंत ने ब्रजभाषा काव्य की आलोचना करते हुए कहा कि खड़ी बोली की स्वर्णिम आशा की कल्पना की थी। खड़ी बोली की महत्ता को वर्णन करते हुए पंत ने कहा खड़ी बोली साहित्य के क्षेत्र में स्वार्णिम अध्याय जोड़ेगी व मार्ग प्रशस्त करेगी। उनकी मान्यता थी कि खड़ी बोली साहित्य को गद्य एवं काव्य में समृद्ध करेगी। 

सुमित्रानन्दन पंत ने बिम्ब विधान की परिकल्पना करते हुए लिखते हैं काव्य को परिपूर्ण करने के लिए इसकी आवश्यकता होती है। पंत प्रकृति के सुकुमार कवि कहे जाते हैं। उनका मानना था कि काव्य में संगीतात्मकता प्रधान तत्व है। वे सवैया एवं कवित्त में परिमार्जन के पक्ष में थे। पंत की कविता में कल्पना जगत की प्रधानता है। उनकी पल्लव व गुंजन काव्य रचना साहित्य जगत में काफी महत्वपूर्ण स्थान रखती है। पंत जी का मानना था कि काव्य में सदैव परिमार्जन की आवश्यकता होती है।  

डॉ0 प्रेमशंकर त्रिपाठी ने कहा-आचार्य विष्णुकांत शास्त्री आधुनिक काल के आलोचक रहे हैं। शास्त्री संस्मरणकारों में अग्रणी भूमिका रही है। वे बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। सम्मोहक वक्ता थे। आलोचक विद्वान, लेखक, राजनीतिज्ञ थे। शास्त्री के साहित्य की चर्चाएं कम हुई हैं। शास्त्री ने संस्मरण, आलोचना व रिपोतार्ज लेखन में अपनी महत्वपूर्ण लेखनी चलायी। उनकी लगभग 30 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। आचार्य विष्णुकांत शास्त्री को जानने के लिए उनके साहित्य में प्रवेश होकर ही जाना जा सकता है। आचार्य विष्णुकांत शास्त्री ने कहा कि प्रभावित करना तथा प्रभावित होना जीवंतता का प्रमाण है। आचार्य विष्णुकांत शास्त्री ने पथ के पड़ाव को मंजिल नहीं मानी। उनमें राष्ट्रीयता का भाव प्रचुरता से रही।‘सुधियाँ उस चन्दन के वन की संस्मरणात्मक रचनाओं में महत्वपूर्ण रही है। ‘आलोक हुआ अपना पन‘ भी संस्माणात्मक रचनाओं में शास्त्री ने रामविलास शर्मा व अमृत राय, धर्मवीर भारती तथा बाबा नार्गाजुन पर भी  संस्मरण लिखा। वे अपने विरोधी विचारधारा वाले साहित्यकारों के सम्बन्ध में सहजभाव से रचना करते थे। वे सिद्धहस्त कवि व प्रवचनकार थे। ‘प्रखर मेघा अडिग विश्वास‘ रामविलाश शर्मा पर लिखा महत्वपूर्ण संस्मरण है।  

अध्यक्षीय सम्बोधन में डॉ0 सदानन्दप्रसाद गुप्त, मा0 कार्यकारी अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ने कहा आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को साहित्य जगत में कम मूल्यांकन किया गया जो कि चिंता का विषय है। महावीर प्रसाद द्विवेदी का समय मातृ भाषा को महत्व देने का रहा है। उनका मानना था कि मातृ भाषा के बिना स्वराज्य की कल्पना नहीं की जा सकती है। मौलिकता अपनी भाषा में ही व्यक्त की जा सकती है। महावीर प्रसाद द्विवेदी का जीवन तप व तपस्या का जीवन है। वे राष्ट्रभाषा के मूर्तिवान स्वरूप हैं समालोचक के रूप में उनका स्थान अग्रणी रहा है। महावीर प्रसाद द्विवेदी बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी रहे। पंत की ‘पल्लव‘ रचना महत्वपूर्ण रही है। पंत को शिल्प व सौन्दर्य का कवि कहा गया है। पंत के लिए प्रकृति एक दूसरा संसार है मानते हुए अपनी रचनाएं की। पंत छायावाद को व्यक्तिनिष्ठ नहीं बल्कि मूल्यनिष्ठ मानते है। पंत की रचनाओं में राष्ट्रीय चेतना के तत्व विराजमान हैं। पंत हमारे सामने मानवतावादी रचनाकार के रूप में आते हैं। भारत में मानवतावाद चराचरवाद के रूप में हमारे सम्मुख आता है। विष्णुकांत शास्त्री में सम्मोहनकारी क्षमता थी। विष्णुकांत शास्त्री बंग्ला भाषा अनुवाद कार्य भी किया है। विष्णुकांत शास्त्री का मानना था कि लक्ष्य तक पहुँचने के लिए साधना की आवश्यकता होती है। कवि नये-नये शब्दों को गढ़ता है। विष्णुकांत शास्त्री पण्डित्यपूर्ण, आत्माभिमानी, सहज व्यक्तित्व के धनी थे।