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क्यों पूजनीय है जौनपुर का गुरुद्वारा तप स्थान श्री गुरु तेग बहादुर जी, बड़ी संगत ?

क्यों पूजनीय है जौनपुर का गुरुद्वारा तप स्थान श्री गुरु तेग बहादुर जी, बड़ी संगत ?

गुरुद्वारा तप स्थान श्री गुरु तेग बहादुर जी (बड़ी संगत) वाराणसी से 58 किलोमीटर उत्तर में गोमती नदी के तट पर जौनपुर जिले में स्थित है। यह उन स्थानों में है जहां एक प्रसिद्ध सिख संगत लंबे समय से मौजूद है।

जब गुरु तेग बहादुर 1666 में वाराणसी में रह रहे थे, तो स्थानीय मसंद भाई गुरबख्श के नेतृत्व में जौनपुर संगत उनसे मिलने गई थी। भाई गुरबख्श कीर्तन के एक निपुण कलाकार थे और गुरु तेग बहादुर ने उनके कौशल और भक्ति की प्रशंसा में उन्हें एक मृदंग (एक प्रकार का दो मुखी ढोल) उपहार स्वरुप भेंट किया था। गुरु तेग बहादुर स्वयं 1670 में पंजाब की ओर अपनी वापसी यात्रा के दौरान जौनपुर आए थे। यह यादगार पवित्र स्थान, गुरुद्वारा तप स्थान श्री गुरु तेग बहादुर जी (बड़ी संगत) शहर के पूर्व में नदी के बाएं किनारे पर है।

विशाल आयताकार हॉल के एक छोर पर गर्भगृह है। इसके बीच में एक वर्गाकार चबूतरे वाला एक छोटा कमरा मूल तप स्थान का प्रतिनिधित्व करता है, जिसके बारे में माना जाता है कि यह वास्तव में वर्तमान गुरुद्वारे से डेढ़ किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में नदी के बाएं किनारे पर एक रेतीले टीले पर था। चाचकपुर गांव की राजस्व सीमा में इस टीले के ऊपर आज भी एक आयताकार इमारत के खंडहर देखे जा सकते हैं। यह झोपड़ी और इसके आसपास की लगभग दो एकड़ जमीन आज भी गांव के राजस्व अभिलेखों में गुरुद्वारा बड़ी संगत के नाम से दर्शाई गई है। 

जौनपुर के राव मंडई मोहल्ले में एक निजी घर में एक और गुरुद्वारा, छोटी संगत हुआ करता था, किन्तु 1960 के दशक के मध्य में इसके अंतिम सिख निवासी सरदार जवाहर सिंह के देहान्त उपरान्त इसका अस्तित्व समाप्त हो गया। इसके दो पवित्र अवशेष, गुरु ग्रंथ साहिब की एक हस्तलिखित प्रति और गुरु तेग बहादुर की ओर से उपहार माना जाने वाला एक स्टील का तीर अब गुरुद्वारा तप स्थान बड़ी संगत में रखा गया है। इस गुरुद्वारे में क्रमशः 1742 बिक्रमी और 1801 बिक्रमी के पवित्र शास्त्र की दो हस्तलिखित प्रतियाँ हैं।