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काल भैरव मंदिर, वाराणसी में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व का मंदिर

काल भैरव मंदिर, वाराणसी में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व का मंदिर

काल भैरव मंदिर विशेश्‍वरगंज के पास स्थित वाराणसी के सबसे प्राचीन मंदिर के रूप में जाना जाता है। काल भैरव मंदिर काशी विश्वनाथ मंदिर से 1 किमी और वाराणसी जंक्शन से 5 किमी की दूरी पर स्थित है।

भगवान भैरव नाथ को समर्पित इस मंदिर का हिंदू धर्म में महान ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है; खासकर स्थानीय लोगों के बीच। काल भैरव को भगवान शिव की वीभत्स अभिव्यक्ति के रूप में माना जाता है जो नर मुण्ड कंकाल की एक माला पहने हुए हैं और उनके हाथ में मोर पंखों का एक गुच्छा और त्रिशूल हैं। भगवान काल भैरव को वाराणसी का संरक्षक देवता माना जाता है और जो कोई भी वाराणसी में रहना चाहता है उसे उनकी अनुमति लेनी होती है। उन्हें 'सती पिंड' का कोतवाल भी माना जाता है, उनकी अनुमति के बिना कोई भी 'सती पिंड' को नहीं छू सकता है।

पौराणिक कथा के अनुसार भगवान भैरव का जन्म, भगवान शिव के तीसरे नेत्र से हुआ था और वे क्रोध के प्रतीक हैं। भगवान शिव के आदेश पर उन्होंने ब्रह्मा का एक सिर काट दिया। ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर काटने से वह दोषी हो गए, इसलिए भगवान शिव ने उन्हें काशी जाने की सलाह दी जहाँ उन्हें पापों से छुटकारा मिलेगा और उन्हें वहाँ रहने और अपने भक्तों की देखभाल करने के लिए भी कहा। काल भैरव मंदिर के गर्भगृह में काल भैरव की चांदी की मूर्ति है, जो कुत्ते पर विराजमान है और त्रिशूल धारण किए हुए है। दर्शनार्थियों को द्वार से केवल मूर्ति का मुख ही दिखाई देता है, मूर्ति का शेष भाग वस्त्र आभूषण इत्यादि से ढका हुआ है।