महान स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक की सोच थी आज का गणेश उत्सव!

महान स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक की सोच थी आज का गणेश उत्सव!

गणेश चतुर्थी भारत में मुख्य रूप से महाराष्ट्र में मनाए जाने वाले कुछ सबसे बड़े त्योहारों में से एक है। समय के साथ, यह त्यौहार दक्षिण भारत और गुजरात के कई हिस्सों में फ़ैल गया और आज लगभग पूरे हिन्दोस्तान में इसे बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। लेकिन हमेश से ये त्यौहार ऐसा नहीं था। आज़ादी से पहले, वर्षों से गणेश चतुर्थी को सभी हिन्दू अपने अपने घरों में ही मनाया करते थे।  

दस दिनों तक चलने वाले इस त्योहार में भगवान गणेश के जन्मदिन के उपलक्ष्य में भक्त पूजा अर्चना और व्रत इत्यादि रखते हैं। अगर इतिहास के पन्ने पलट कर देखें तो पता चलता है कि महान मराठा सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिन्दू संस्कृति और राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने के लिए गणेश चतुर्थी को एक सामाजिक त्योहार का रूप दिया। विघ्नहर्ता भगवान गणेश  पेशवाओं के इष्ट देवता थे और उनके शासनकाल के दौरान गणेश पूजा को बहुत बल भी मिला।  

लेकिन धीरे धीरे मुगलों के शाशन और अंग्रेजी राज के दौरान गणेश चतुर्थी का रंग फीका पड़ने लगा था।  ऐसे में महान क्रांतिकारी नेता बाल गंगाधर तिलक ने गणेश उत्सव को एकबार फिर जीवनदान दिया। हालाँकि तिलक की सोच गणेश उत्सव को लेकर कुछ और ही थी।  

दरअसल 1857 के अंग्रेजी राज के खिलाफ भारतीय विद्रोह के समय बाल गंगाधर तिलक को ये मेहसूस हुआ की ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के खिलाफ देशवासियों को एकजुट करने की ज़रूरत है और उन्हें लगा की गणेश पूजा लगभग पूरे देश खासकर के महाराष्ट्र में बेहद प्रचलित थी।  उन्होंने अवसर को पहचाना और अंग्रेजी शाशन के खिला लोगों को एक जुट करने के लिए गणेश चतुर्थी को सामाजिक समाहरोह में बदलने का फैसला लिया। 

तत्कालीन भारत में हिन्दू समाज जात पात के कुरीतियों से बटा हुआ था, और उन्हें एक करने का इससे अच्छा मौका कुछ नहीं था।  तिलक ने देखा कि भगवान गणेश को "हर आदमी का भगवान" माना जाता था, गणेश पूजा उच्च वर्ग और निचली जातियों में, महिलाओं और पुरुषों में , व्यस्क और वृद्धों में  समान रूप से की जाती थी। इसलिए उन्होंने गणेश चतुर्थी को 'ब्राह्मणों और गैर-ब्राह्मणों के बीच की खाई को पाटने' के लिए एक राष्ट्रीय त्योहार के रूप में लोकप्रिय बनाने का प्रयास किया।

अपने इसी लक्ष्य को साधने के लिए सन 1893 में तिलक ने सामाजिक और धार्मिक समारोह के रूप में गणेश उत्सव का आयोजन किया। उन्होंने ही गणेशोत्सव के दसवें दिन विशाल गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन की परंपरा की नीव राखी जो आज ता कायम है।  इतना ही नहीं तिलक ने ही मंडपों में भगवान गणेश की छवियों के साथ बड़ा होर्डिंग लागकर समाजको एकीकृत करने की दूरदृष्टि रखी थी। तिलक का ये प्रयास फलीभूत हुआ और समाज को एक साथ लाकर एक पटल पर खड़ा करने में सफल रहा।  

गणेशोत्सव ने स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाई, खासकर तब जब अंग्रेजी शासन के द्वारा सार्वजनिक सामाजिक, राजनीतिक सभाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।

इसके बाद तो गणेशोत्सव एक सामाजिक आंदोलन में बदल गया जिसने अंग्रेजी साम्राज्य की नीव हिला दी।  उस समय के बड़े क्रांतिकारी नेता लाला लाजपत राय, बिपिनचंद्र पाल, अरविंदो घोष और राजनरायण बोस ने भी गणेशोत्व में तिलक का समर्थन किया था।  जिसके बाद तिलक उस समय के सबसे ज्यादा प्रखर कांग्रेस नेता के रूप में लोकप्रिय हो गए।

देश के अन्य हिस्सों में भी क्रांतिकारियों ने इस रणनीति को अपनाया। एक और गरम दल के क्रांतिकारी नेता वीर सावरकर ने भी गणेश उत्सव में अवसर को देखा और नासिक में गणेश उत्सव मनाने के लिए मित्र मेला संस्था बनाई। इसका संस्था का काम था देशभक्तिपूर्ण मराठी लोकगीत पोवाडे आकर्षक ढंग से बोलकर सुनाना। पोवाडों ने पश्चिमी महाराष्ट्र में उस समय धूम मचा दी थी। 

आज विश्व में भारतीय संस्कृति की पहचान बन चुका है गणेशोत्सव जिसे सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि पूरे वश्व में हिन्दुओं द्वारा धूम धाम से मनाया जाता है।   महाराष्ट्र में तो बड़े बड़े पंडालों में भगवान् गणेश की बड़ी बड़ी मूर्तियां स्थापित की जाती हैं और बड़े ही धूम धाम से इस उत्सव को सभी धर्म और जाती के लोग मानते हैं। 

ये भी पढ़ें 

0Comments