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जाने द अक्षर का महत्व

जाने द अक्षर का महत्व

द" अक्षर का महत्व
बृहदारण्यक उपनिषद में बड़ा सुंदर सूत्र दिया गया है।
पंचम अध्याय के द्वितीय ब्राह्मण से लिया गया है, इसमें प्रजापति का देव मनुष्य और असुर तीनों को एक ही अक्षर "द" से पृथक पृथक दम,दान और दया का उपदेश किया गया है।

देव मनुष्य और असुर, इन प्रजापति के तीन पुत्रों ने पिता प्रजापति के यहां ब्रम्हचर्य वास किया। ब्रह्मचर्य वास करने पर देवो ने कहा आप हमें उपदेश दीजिए ।उनसे प्रजापति ने द अछर कहा और पूछा,  समझ गए क्या? इस पर देव ने कहा आपने हमसे दमन करो कहा है,तब प्रजापति ने कहा ठीक है, तुम समझ गए ।
 
फिर प्रजापति से मनुष्यों ने कहा आप हमें उपदेश दीजिए उनसे भी प्रजापति ने "द" अछर ही कहा और पूछा समझ गए क्या,  मनुष्यों ने कहा आपने हमसे दान करो कहा है,तब प्रजापति ने कहा, हां समझ गए ।

फिर प्रजापत से असुरों ने कहा आप हमे उपदेश दीजिए, उनसे भी प्रजापति ने "द" ही कहा और पूछा समझ गए क्या,  असुरों ने कहा आपने हमसे दया करो कहा है, तब प्रजापत ने हां समझ गए ।

प्रजापति के अनुशासन का मेघगर्जना रूपी देवी वाक् आज भी द द द इस प्रकार अनुवाद करती है, अर्थात दमन करो, दान दो और दया करो। अतः दम दान और दया इन तीनों को सीखो। 

तात्पर्य – हम सभी प्रजापति की ही संतान है, उन्हीं के वंशज हैं।उनकी संतानों में देव मनुष्य और असुर तीनों ने दीर्घकाल तक पिता प्रजापति के पास ब्रम्हचर्य वास किया। शिष्य भाव से वर्तने वाले पुरुष के जितने भी धर्म हैं उन्हें ब्रह्मचर्य की प्रधानता है,इसलिए शिष्य होकर उन्होंने ब्रह्मचर्य पूर्वक निवास किया और उसी भाव से प्रजापति से कहे, पिता आप में उपदेश दीजिए।  प्रजापति ने देवताओं  मनुष्यो और असुरों तीनों पुत्रों को "द" अक्षर का उपदेश दिया। जिसका तात्पर्य – दमन करो,दान दो,दया करो।

स्मृति मे भी यही संकेत है कि काम, क्रोध और लोभ यह नरक के 3 दरवाजे हैं,जो आत्मा का नाश करने वाले हैं, इसलिए इन तीनों को त्याग दें।