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तो कहूँ...

तो कहूँ...

कुछ बातें हैं अनकहीं सी,
अगर तुम सुनो, तो कहूँ,
मेरे प्रेम की मूक भाषा,
अगर सुन सको, तो कहूँ;

उम्मीदों के धरातल पर,
तुम में एक किरण दिखती है मुझे,
उम्मीदों की उस जमीं पर,
मेरे संग चल सको, तो कहूँ;

मेरे साथ चलते हुए राहों में, 
कुछ उलझनें भी तो आयेंगी,
उन उलझनों को सुलझाने में,
तुम मुझ संग उलझ सको, तो कहूँ;

मेरे सफर के पड़ावों में शायद,
कभी-कभी रुकना पड़े, तुम्हें भी,
तो उस सफर के दरम्यान,
मेरे लिए थम सको, तो कहूँ;

श्वेत-श्याम से मेरे जीवन में,
हुआ अभी रंगो का आगाज़ नहीं,
अपने प्रेम और विश्वास के रंगो से,
तुम मुझे रंग सको, तो कहूँ;

सिर्फ अपनी तुम्हें सुनाने की, 
रहती है मुझे आरज़ू नहीं,
अपने मन के भावों को तुम भी, 
मुझसे कह सको, तो कहूँ;

मैं तो हूँ तेरी तब से ही,
जब से तुझको जाना है,
तुम भी मेरे लिए समर्पित,
होकर रह सको, तो कहूँ।
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----(Copyright@भावना मौर्य "तरंगिणी")---

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