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कहानी- ये आँखे कुछ कहती हैं (भाग-8) (अंतिम भाग)

कहानी- ये आँखे कुछ कहती हैं (भाग-8) (अंतिम भाग)

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कहानी-ये आँखे कुछ कहती हैं (भाग-7): https://medhajnews.in/news/entertainment/poem-and-stories/these-eyes-are-saying-something-Part7


कहानी अब आगे की .....

कहानी- ये आँखे कुछ कहती हैं (भाग-8) (अंतिम भाग)

विशाल- सर, मैं अपनी गुड़िया को तो नहीं बचा पाया पर उसकी इस इच्छा को पूरा करने में पीछे नहीं हटूँगा। पर क्या डॉक्टर साहब, एक बार मैं उस लड़की से मिल सकता हूँ जिसे मेरी गुड़िया की आँखें मिलने वाली हैं?

 

डॉक्टर- 'विशाल जी, वैसे तो ये रूल के अगेंस्ट हैं पर चूँकि आपने मेरी सलाह का मान रखा तो मैं आपको ज़रूर मिलवाऊंगा उनसे।'

 

विशाल- थैंक यू सर!!

 

डॉक्टर विशाल को साथ लेकर उन  बुजुर्ग दंपत्ति के पास गये और उन्हें पूरी बात बताई। डॉक्टर की बात सुनते ही वे बुजुर्ग दंपत्ति फफक कर रो पड़े और विशाल के पैरों में गिरकर कहने लगे- 'हमें माफ़ कर दो बेटा, हम उस नेक बच्ची को नहीं बचा पाए (उनकी आँखों में आँसू और कृतज्ञता दोनों ही साफ झलक रही थी) और हमें बचाते-बचाते वो खुद.... और हिम्मत तो देखो उसकी जाते-जाते भी हमारी बच्ची की आँखों को रोशनी देते जा रही है। हम पूरी ज़िन्दगी ऋणी रहेंगे उसके और आपके भी।' विशाल ने उन्हें कन्धों से पकड़ते हुए ऊपर उठाया और कहा- 'अंकल, शायद होनी को यही मंजूर था पर अब आप रूही का ख्याल रखियेगा। उसे स्वस्थ और खुश देखकर मैं समझूंगा कि मेरी गुड़िया की आँखों में खुशियाँ झिलमिला रही हैं।'

 

फिर विशाल उनके साथ रूही से मिलने पहुँचा। रूम में घुसते ही उसने देखा कि रूही एकदम उदास सी बैठी हुई शून्य में देख रही हो जैसे। जैसे इन अंधी आँखों से भी कुछ ढूँढने का प्रयास कर रही हो। वैसे तो वो बहुत खूबसूरत थी पर बीते दिनों की घटना ने उसे बहुत सदमा पहुँचाया था और उसका चेहरा तेजहीन हो गया था। उन लोगों ने रूही से बात करने की भी कोशिश की पर रूही ने किसी की बात पर कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी जैसे उसे कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा हो। विशाल ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा- आंटी-अंकल, मेरी इस गुड़िया का ख्याल रखियेगा और इसे हमेशा खुश रखियेगा। ये कहकर वो आँखों में आंसू लिए रूम से बाहर चला गया।

 

डाक्टर ने भव्या के नेत्रों को संरक्षित कर लिया जिसका कि कुछ दिनों में रूही की आँखों में प्रत्यारोपण होना था और भव्या के मृत शरीर को विशाल और हमें सौप दिया ताकि हम उसका अंतिम संस्कार कर सकें। तभी अचानक से विशाल ने तुम्हारे बारे में पूछा तो मैंने उसे भव्या की इच्छा बता दी और ये भी कि वो नहीं चाहती थी कि तुम्हारा इंटरव्यू होने तक, तुम्हें कुछ भी बताया जाये। विशाल ने कहा- 'ठीक है अगर गुड़िया नहीं चाहती थी तो कोई भी मैडी को कुछ भी नहीं बतायेगा।' और हम सबने भव्या को नीर भरे नेत्रों से अंतिम विदाई दी। 3-4 दिन बाद विशाल भी वापस चला गया। कुछ दिन बाद पता चला कि रूही की आँखों का आप्रेशन भी हो गया है और सफल रहा है। पर उसे बहुत गहरा सदमा लगा था जिससे वो उबर नहीं पा रही थी बस हर वक्त अकेले ही रहती थी और किसी भी बात पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देती थी। इसीलिए उसके परिवार वाले उसे इस शहर से दूर और मंदिरों की नगरी बनारस लेकर चले गए कि शायद परिवेश बदलने से उसमें कुछ सकारात्मक बदलाव आये। जब तुम्हारे इंटरव्यू के रिजल्ट आने के बाद तुम्हारा कॉल आया कि मम्मा- 'भव्या कहाँ है? उसका नंबर ही नहीं लग रहा है। वैसे मैं उसे ही सबसे पहले बताना चाहता था पर अब मेरा फ़ोन न उठाने की सजा उसे मिलेगी और एज पनिशमेंट उसे अब बाद में बताऊंगा। मम्मा कॉंग्रेट्स मी, मेरा इंटरव्यू क्लियर हो गया है और अगले महीने मसूरी निकलना है ट्रेनिंग के लिए।’ तू उस ओर से कहता जा रहा था ओर इस ओर मेरे तो आंसू ही नहीं रूक रहे थे। क्या बताती तुझे कि खो दिया हमने भव्या को? फिर तेरे पापा को फोन पकड़ा दिया कि शायद वो तुझे कुछ बता पाए। फिर आगे तो तुझे पता ही है न कि कितनी मुश्किल से वो शब्द बोल पाए थे वो कि- 'बेटा भव्या हमे छोड़ कर चली गयी, एक ऐसी दुनिया में जहाँ से कोई वापस नहीं आ सकता।' और तुमने हम लोगों पर विश्वास ही नहीं किया और जब किया तो हमसे बात करना, यहाँ तक कि यहाँ आना ही बंद कर दिया। फिर हमने विशाल को बोला कि वो तुम्हें समझाए और भव्या की खातिर ही सही ट्रेनिंग में जाने को बोले। उसके समझाने पर तुम ट्रेनिंग के लिए तो मान गए क्योंकि ये भव्या की ख्वाहिश थी पर तुमने हमसे बात करनी ही बंद कर दी। उसके बाद आज यहाँ आये हो वो भी सिर्फ अपनी भव्या से मिलने।' ये कहते हुए स्मिता जी के आँखों से आँसू लगातार बहते ही जा रहे थे। फिर खुद को संयत करते हुए वो बोली बेटा तुमसे ज्यादा हम उसे अपने घर लाना चाहते थे पर वक्त और होनी को कोई नहीं बदल सकता।

 

वक्त अगर रूकता तो बदल जाती कहानियाँ,

प्रकृति का नियम जब भी बदलने की कोशिशें हुई हैं-

तो बढ़ीं हैं, सिर्फ और सिर्फ परेशानियाँ;

जिसका जाना लिखा है उसे रोकना बस में नहीं किसी के,

पर बस में है हमारे कि याद करें,

जाने वाले की बस अच्छी निशानियाँ।

 

'तो प्लीज आगे बढ़ो अब, वरना भव्या उस दुनिया में भी खुश नहीं रह पायेगी।'

 

मृदुल, स्मिता से लिपट कर रोने लगा और बोला-‘मम्मा मेरी भव्या को कितना दर्द हुआ होगा न और मैं कुछ नहीं कर पाया। कैसे आगे बढ़ूँ मम्मा? उसके जैसा कोई था ही नहीं, कैसे उसकी जगह दे पाउँगा मैं किसी को भी? कभी नहीं दे पाउँगा, कभी नहीं? वो बहुत हिम्मत वाली थी जो अपने आखिरी समय में भी किसी को ज़िन्दगी दे गई पर मैं इतना स्ट्रांग नहीं हूँ। कुछ हूँ ही नहीं मैं, उसके बिना।’  स्मिता उसके सिर को सहलाते जा रही थी। तभी मृदुल ने कहा कि- 'पता है मम्मा भव्या ने कल मुझसे कहा था कि वो जाकर भी इसी दुनिया में है शायद इसलिए क्योंकि उसकी उन रूहानी आँखों से कोई इस दुनिया देख रहा है।'

 

स्मिता- 'हाँ बेटा, तू सही कह रहा है, शायद उसका वही मतलब रहा होगा।'

 

मृदुल- 'मम्मा, आई ऍम रियली वैरी सॉरी टू यू एंड डैड, मैंने बहुत बुरा बर्ताव किया आप लोगों के साथ। प्लीज मुझे माफ़ कर दीजिये।'

 

स्मिता- 'कोई बात नहीं बेटा, हम सब समझते हैं। जब हम लोग भव्या का जाना बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे तो तुमने तो अपना दोस्त, हमदर्द और प्यार सब खो दिया। तो किस तरह तुमने सब सहा होगा वो तो हमारे लिए अकल्पनीय है। पर अब तुम्हें आगे बढ़ना ही होगा, कोई जल्दबाजी नहीं है जितना चाहो वक़्त ले लो पर भव्या को अच्छे पलों के साथ याद करो दुःख के साथ नहीं। क्योंकि वो बस तुम्हें खुश देखना चाहती थी।'

 

सच ही है.....

ज़िन्दगी केवल नाम नहीं हैं सुख और दुखों का;

इसमें तो समावेश है हर तरह के अनुभवों का।

कभी-कभी हार जाती है हालातों के आगे,

तो कभी-कभी अपनों के लिये बहुत कुछ सहती है,

ध्यान से सुनकर देखो तो, ये ज़िन्दगी बहुत कुछ कहती है।

 

मृदुल- 'हम्म ....मैं पूरी कोशिश करूँगा मम्मा' (ये कहकर वो स्मिता से लिपट जाता है और चाहकर भी अपने आँसुओं को रोक नहीं पाता है। और फिर भव्य को याद कर फफक पड़ता है।)

 

यादों की वो किताब, पढ़ता हूँ मैं जब भी,

याद आने लगती हो तुम, बेइन्तहां-बेइन्तहां,

वो आदतें तेरी, मुझे बेवजह सताने की,

रूठ जाने पर फिर, मुझे बार-बार मनाने की,

याद आती हैं मुझे, बेइन्तहा-बेइन्तहा;

तेरी आँखों में उमड़ता था जो एहसासों का समुंदर,

तेरी बातों में झलकता था जो प्रेम का मंजर,

पलकें भीगा जाता है मेरी बेइन्तहां-बेइन्तहां,

वो बिन जताये भी तेरा, मेरी ढाल बनके रहना,

मेरी नादानियों को भी, हँसते हुए यूँहीं सहना,

तड़पा जाता है मुझे, बेइन्तहा-बेइन्तहा;

यादों की वो किताब, पढ़ता हूँ मैं जब भी...!!

 

 

★★★★★

----(Copyright@भावना मौर्य "तरंगिणी")---

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