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आज का श्लोक

आज का श्लोक

श्लोक =आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टु मामदर्शनान्-मर्महतां करोतु वा।
यथा तथा वा विदधातु लम्पटो मत्प्राणनाथस्-तु स एव नापरः॥८॥
श्लोक का सार= भगवन श्रीकृष्ण के अतिरिक्त मेरे कोई प्राणनाथ हैं ही नहीं और वे ही सदैव बने रहेंगे, चाहे वे मेरा आलिंगन करें अथवा दर्शन न देकर मुझे आहत करें। वे नटखट कुछ भी क्यों न करें -वे सभी कुछ करने के लिए स्वतंत्र हैं क्योंकि वे मेरे नित्य आराध्य प्राणनाथ हैं॥

कहानी= जब मन से सच्ची आस्था और प्रेम होता है तो वो आपको दिखे न दिखे मिले न मिले आपको फर्क नही पड़ता है ! वैसे ही अगर आपके मन में भगवान के लिए सच्ची आस्था है तो भगवान आपको मिले न मिले लेकिन आपके मन यह विश्वास हमेशा होता है की अगर वो है तो आपके साथ कुछ गलत नही हो वो आपके साथ कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र है आपके मन से बिना कोई भी विचार आपको आपके धर्म और आस्था से नहीं रोक सकता ! इसलिए श्री कृष्णा गीता में कहते है की हे अर्जुन , जब कुछ भी  समझ न आये तो अपना सब भगवान को समर्पित कर दो क्योकि  जो मार्ग भगवान ने तुम्हरे लिए देख रखा होगा उससे अच्छा  तुम्हारे लिए कुछ नहीं होगा! बस विश्वास रखना जो हो रहा है या जो होगा वो तुम्हारे हित में होगा 
!!जय श्री कृष्णा!!