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तुम जब याद आते हो

तुम जब याद आते हो

तुम जब-जब याद आते हो,
जाने कितने ही दफ़ा,
मेरी नज़्मों में ढल जाते हो;
जब भी कलम उठती है तुझे सोचते हुए,
कभी कहानी, कभी नगमा,
तो कभी ग़ज़ल बन जाते हो;
जाने कितनी उपमायें छीन लेते हो मुझसे,
कभी क्षितिज, कभी बादल,
तो कभी कमल बन जाते हो;
कभी मेह बन मुझे भिगो देते हो तुम
और कभी छू जाते हो तुम बयार बन के,
तो कभी सागर की तरह अविरल बन जाते हो;
बहुत मुश्किल है तुझसे बेख्याल होना,
कभी यादें, कभी चाहतें,
तो कभी शग़ल बन जाते हो।
★★★★★
-----(Copyright@भावना मौर्य "तरंगिणी")----
(*मेह: बारिश, शग़ल: आदत/पसंद)

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तो कहूँ: https://medhajnews.in/news/entertainment-poem-and-stories-so-i-say