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सड़कें

सड़कें

ये सडकें भी न कितनी अजीब होती हैं...

मंजिल पता हो तो पहुँचा देती हैं,
अगर न पता हो तो भटका देती हैं,
जानें कितनों का मिलन देखा है इन्होंने,
कितने ही बिछड़ों का अश्क बहा देती हैं;

ये सड़कें भी न कितनी अजीब होती हैं...

कितने मैदान, पर्वत, नदियों के किनारें,
और कितने देशों की सरहदों को मिला देती हैं,
खामोश ही रहती हैं हर मौसम हर घड़ी ये,
पर बहुतों को जीवन का मर्म समझा देती हैं;

ये सड़कें भी न कितनी अजीब होती हैं...

कइयों को अपने घर तक प्रतिदिन पहुँचाती है ये,
तो कई लोगों का यही आशियाना और पनाह होती हैं,
किसी की बारात इन्हीं से होकर गुजरती है,
तो किसी की अंतिम विदाई की भी ये गवाह होती हैं;

ये सड़कें भी न कितनी अजीब होती हैं...

कभी सीधी, सरल, नितांत अकेली सी रहती हैं,
तो कभी अनगिनत गाड़ियों की भीड़ से परेशान होती हैं,
दूजे हित के लिए ही अस्तित्व इनका गढ़ा जाता है,
ये खुद अपने ही अस्तित्व से गुमराह होती हैं;

ये सड़कें भी न कितनी अजीब होती हैं...।
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---(Copyright@भावना मौर्य "तरंगिणी")---

नोट: मेरी पिछली रचना आप इस लिंक के माध्यम से पढ़ सकते हैं- 
माँ कहूँ या भगवान- https://medhajnews.in/news/entertainment/poem-and-stories/mother-or-almighty