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एक स्त्री जानती है

एक स्त्री जानती है

एक स्त्री जानती है,
अपनी मर्यादाओं को, अपनी क्षमताओं को,
अपनी शक्ति को, अपनी विवशताओं को,
पर कर सकती है वो नामुमकिन को भी मुमकिन,
जब वो अपने अहम् पर कुछ भी ठानती है।
एक स्त्री जानती है,
उस पर उठने वाली निगाहों की भाषा,
कि वो क्या कहती हैं, क्या चाहती हैं,
अपनापन है उनमें या है कोई कामना,
वो ये बाखूबी पहचानती है;
एक स्त्री जानती है,
उसे छूकर गुजरे हुए स्पर्श के हर भाव को,
उस छुअन के पीछे का मतलब,
निश्छल प्रेम है या कोई छिपी वासना,
वो बिन कहे ही पहचानती है;
एक स्त्री जानती है,
अपने अपनों के अनकहे एहसासों को,
समझ लेती है वो मन के सभी बहावों को,
खुद की कीमत जानते हुए भी,
अपनों के लिए वो खुद को कम आँकती है;
एक स्त्री जानती है 
कि उसका अस्तित्व जरुरी है पुरुष की पूर्णता के लिए
पति के मोक्ष के लिए, हर रिश्तों की सम्पूर्णता के लिए,
भुला कर अपने हर सपने और अस्तित्व को,
वो खुद को अपनों पर वारती है।
---(Copyright@भावना मौर्य "तरंगिणी")---
(नोट: यहाँ मैंने एक आदर्श स्त्री के ऊपर अपनी रचना केंद्रित की है जो कि अधिकांशतः स्त्रियों की मनोदशा और  स्थिति को व्यक्त करती है परन्तु अपवाद हर जगह होते हैं और आधुनिकता के साथ-साथ स्त्रियों की मनोदशा, स्थिति और स्वावलम्बिता में भी अंतर आया है। इसलिए हर स्त्री पर ये रचना सटीक हो या आवश्यक नहीं है। अतः कृपया इसे किसी व्यक्ति विशेष से न जोड़ें।) 

नोट: मेरी पिछली रचना आप इस लिंक के माध्यम से पढ़ सकते हैं- 
कुछ सच्चा सा: https://medhajnews.in/news/entertainment/poem-and-stories/some-truth