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गुस्ताखियाँ

गुस्ताखियाँ

अपनी नज़रों से कह दो,
कि यूँ गुस्ताखियाँ न करें,
उनका यूँ देख कर झुक जाना,
दिल धड़काता है मेरा;
लम्बी मुलाकात नहीं होती,
ज्यादा बात नहीं होती,
पर उन चंद अल्फ़ाज़ों के लेन-देन-
से ही दिन कट जाता है मेरा;
कुछ खोये-खोये से रहते हो,
भरी महफ़िल में तुम भी,
शायद डूबे रहते हो मेरी यादों में,
ऐसा ही कुछ अंदाजा है मेरा;
ज्यादा उम्मीदें मत रख,
ज्यादा गुस्ताखियाँ मत कर,
अपनी हद में रह ,
मोहब्बत में मत पड़,
अक्सर वक्त-बेवक्त ,
दिल यही समझाता है मेरा;
पर तेरे सामने होने पर, 
दिल जाने कहाँ खो जाता है मेरा ,
तब न हद याद रहती है,
न दिमाग की हिदायतें,
फिर तुझे ही पूरे हक़ से, 
दिल पाना चाहता है मेरा,
तब मेरा, रहता ही कहाँ है,
ये तो हो जाता है तेरा
---(Copyright@भावना मौर्य "तरंगिणी")---

नोट: मेरी पिछली रचना आप इस लिंक के माध्यम से पढ़ सकते हैं- 
कभी-कभी बस यूँहीं...!! - https://medhajnews.in/news/entertainment/poem-and-stories/sometimes-just-like-that