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कहानी- क्योंकि तुम एक भारतीय हो (भाग-3)

कहानी- क्योंकि तुम एक भारतीय हो (भाग-3)

नोट:- इस कहानी के पहले से प्रकाशित भागों को आप निचे लिखे लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं:
भाग-1:  https://medhajnews.in/news/entertainment/poem-and-stories/because-you-are-an-indian
भाग-2:  https://medhajnews.in/news/entertainment/poem-and-stories/because-you-are-an-indian-P2

अब आगे की कहानी..........

'आगे क्या हुआ एडी?' अवि बहुत ही उत्सुकता से एडी की बातें सुन रही थीं और हर एक लाइन के साथ उसकी उत्सुकता बढ़ती ही जा रही थीं।
एडी ने बोलना शुरू किया 'एक बार डैड अपने कॉलेज की तरफ से इंटरकंट्री डिबेट कम्पटीशन में हिस्सा लेने के लिए और दस दिनों के टूर पर इंडिया गए थे। वहाँ बीएचयू में डिबेट कम्पटीशन के बाद उन्हें सात दिनों के लिए इंडिया में अपने हिसाब से घूमने की आज़ादी थी। सुकन्या माँ बीएचयू में ही पोस्ट ग्रेजुएशन की स्टूडेंट थीं और अपने कॉलेज की तरफ से वो भी डिबेट में हिस्सा ले रही थीं। सुकन्या माँ अपने नाम की तरह ही कोमल मन वाली और सुंदरता की अप्रतिम छवि थीं और कोई भी उनकी आँखें देखकर तो खुद को ही भूल जाए। पर जितनी कोमल वो दिखती थीं उतनी ही दृढ़ता से वो अपनी बात भी रखती थीं। डैड का भी उनसे सामना उस डिबेट कम्पटीशन के दौरान ही हुआ था और वे भी सुकन्या माँ से प्रभावित हुए बिना रह नहीं सके थे। उसके बाद वो उन्हें अपनी तरफ आकर्षित करने की चेष्टा करने लगे पर सुकन्या माँ अपने भारतीय संस्कारों का बहुत सम्मान करती थीं और साथ ही ऐसे किसी भी परदेशी पर विश्वास करना उन्हें सही नहीं लग रहा था। तो जब कई बार मना करने पर भी जब डैड ने उन्हें प्रेम का इज़हार करना बंद नहीं किया तो उन्होंने डैड को साफ शब्दों में कह दिया कि बिना विवाह के वो किसी भी युवक से प्रेम का रिश्ता नहीं रख सकतीं। पर डैड तो उन्हें किसी भी हाल में पाना चाहते थे फिर चाहे वो बंधन विवाह का ही क्यों न हो और वैसे भी उन्हें इंडिया में रहना ही कितना है। एक बार वापस गए तो कौन किसी को याद रखता है। उधर सभी विद्यार्थियों को अपने देश वापस जाने से पहले सात दिनों के लिए अपने हिसाब से घूमने की स्वतंत्रता दी गयी थी। तो डैड ने सुकन्या माँ से दोस्ती और 'अतिथि देवो भव:' के संस्कारों का वास्ता देते हुये बनारस के मंदिर, घाट और भी आस-पास की जगह दिखाने की रिक्वेस्ट की। माँ भी तैयार हो गई। ऐसे ही किसी मंदिर में दर्शन करते हुए डैड ने माँ से विवाह ही पेशकाश की। जिसे पता नहीं क्यों कुछ पल सोचने के बाद माँ ने स्वीकार कर लिया था (शायद माँ भी डैड को पसंद करने लगी थीं तब तक)। फिर उन दोनों ने उसी मंदिर में भगवान को साक्षी मानकर एक-दूसरे को वरमाला पहनाते हुए अपने पति-पत्नी के रिश्ते को स्वीकार किया। उस दिन की रात और उसके बाद के कुछ दिन जब तक डैड इंडिया में रहे, उनके मिलन के गवाह बनें। परंतु जहाँ ये रिश्ता डैड के लिए कुछ पलों के सुकून का ही था, अपनी इच्छापूर्ति का था वहीँ माँ के लिए ये जीवन जीने की वजह बन गया था।'

'फिर...?' अवि ने एडी को प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा।

एडी ने एक नज़र अवि की ओर देखा फिर आगे कहना शुरू किया- 'फिर डैड माँ के साथ 5-6 दिन बिताने और कुछ और नयी जगह घूमने-फिरने के बाद, जल्द इंडिया लौटने का वादा कर वापस कनाडा आ गए। माँ भी नहीं चाहती थीं कि उनकी वजह से डैड अपना देश, अपना घर, अपनी संस्कृति सब छोड़ दें हाँ पर वो ये जरूर चाहती थीं कि डैड कम से कम एक बार तो उन्हें साथ चलने को कहें। अगर डैड ने कहा होता तो शायद वो बिना किसी बहस और शर्त के सहर्ष तैयार हो जातीं। पर डैड इतने खुशकिस्मत न थे और अकेले ही कनाडा वापस चले गए। यहाँ आकर उन्होंने माँ के बारे में दोबारा जानने की कोई कोशिश नहीं की या फिर शायद उन्होंने ये रिश्ता सिर्फ जिस्म तक रखने का पहले ही सोच रखा था। यहाँ पर उन्हें हर तरह की आजादी थी और जिसे आजाद रहने की आदत हो वो बेड़ियाँ पसंद नहीं करता। एक दिन जब उन्हें लगा कि अब उन्हें भी यहाँ शादी करके सेटल हो जाना चाहिए तो उन्होंने अपनी लॉन्ग टर्म गर्लफ्रेंड यानि कि मेरी मॉम-मिसेज कार्टर से शादी का प्रस्ताव रखा जिसे कि मॉम ने भी सहर्ष स्वीकार कर लिया क्योंकि वो भी जानती थीं कि यहाँ किसी भी रिश्ते को जीवन भर निभाने की कोई बंदिश नहीं है। सब ठीक रहा तो अच्छा वरना रास्ते अलग कर लेंगे और ये बात उन्होंने डैड से साफ शब्दों में कह भी दी थी। फिर उनकी शादी के दो सालों बाद मैं मॉम और डैड के जीवन में आ गया। सब कुछ सही चल रहा था और तब तक में 5 साल का हो चुका था पर एक दिन मॉम ने डैड से कहा कि वो अब डैड के साथ नहीं रह सकती क्योंकि उन्हें अब एलेक्स से प्यार है और मेरी रिस्पांसिबिलिटी भी डैड को ही लेनी होगी। पर डैड मॉम से प्यार करते थे और उन्होंने मॉम को कन्विंस करने की बहुत कोशिश की पर वो नहीं तैयार थीं। नतीजा ये हुआ कि कुछ ही महीनों में दोनों का डाइवोर्स हो गया। डैड मुझे बहुत प्यार करते थे इसीलिए शायद वो मॉम के कहने पर मेरी रिस्पांसिबिलिटी लेने को बिना किसी बहस के तैयार हो गए।'

'ऐसे ही एक दिन डैड मॉम को याद करते हुए दुखी हो रहे थे और उन्होंने अपनी कबर्ड खोली मॉम की कोई याद देखने के लिए कि तभी उनकी नजर उनके पुराने डिजिटल कैमरे पर पड़ी जिसे वे अपने साथ इंडिया ले गए थे और उसके कवर के अंदर ही एक पर्ची पर सुकन्या माँ का नाम और नंबर भी लिखा था। सुकन्या माँ का ख्याल आते ही डैड के चेहरे पर अनायास ही मुस्कान तैर गयी और उन्होंने झट से मेमोरी कार्ड निकाला और लैपटॉप में लगा दिया। कुछ ही सेकण्ड्स में सुकन्या माँ का खिलखिलाता हुआ चेहरा उनके सामने था किसी फोटो में वो मंदिर में खड़ी थीं, किसी में गंगा के घाटों पर, किसी में पानी-पूरी खाते हुए, किसी में डैड के साथ में लम्बा सिंदूर लगाए हुए, कहीं लहलहाते खेतों के बीच में....ऐसी ही बहुत सी यादें तस्वीरों और वीडियोस के रूप में उस कैमरे में कैद मिली और डैड को बेचैन कर गयीं।' 

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