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मिटटी के घरौंदें

मिटटी के घरौंदें

कभी कुछ मिटटी के घरौंदें, 
मैं भी बनाया करती थी,
उसे सुनहरे और इंद्रधनुषी,
रंगो से सजाया करती थी;
बहुत सोंधी सी महक से, 
महकता था वो गुलशन मेरा,
जिसमें एक-एक सदस्य को,
मैं प्रेम से बसाया करती थी;
निश्छल से रिश्तों से सजता था,
मेरा बसेरा, वो मिटटी का,
उससे अपने लगाव को, मैं 
लौह से भी मजबूत पाया करती थी;
उस छोटे से घरौंदें में,
बने मिटटी के बिछौने पर, 
अपनी गुड़िया के परिवार की, 
मैं महफ़िल सजाया करती थी,
उनके संग खाती थी, बनाती थी,
जाने कितना बतियाया करती थी;
न जिम्मेदारियों की उलझन थी.,
न कुछ खोने का भय था,
मेरे उस घरौंदें में मैं जब-तब,
बेरोक-टोक आया-जाया करती थी;
न बुराई का डर था और 
न ही लड़ाई की कोई चिंता थी,
उस बचपन की दुनिया में,
मैं खुलकर मुस्कुराया करती थी;
मेरे उस बचपन की दुनिया में,
मैं खुलकर मुस्कुराया करती थी।
---(Copyright@भावना मौर्य "तरंगिणी")---

नोट: मेरी पिछली रचना आप इस लिंक के माध्यम से पढ़ सकते हैं- 
Short Story- The Blind Man and The Advertising Story- https://medhajnews.in/news/entertainment/poem-and-stories/short-story-the-blind-man-and-the-advertising-story