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लोगों के बदलते रंग

लोगों के बदलते रंग

मुश्किलें जब भी आती हैं,
तब विश्वास भी डगमगाता है,
ऐसी घड़ियों में ये दुनिया-ये समाज,
अच्छे-बुरे हर तरह के रंग दिखाता है;
कभी खुशियों के मेले होते हैं,
तो कभी दुखों का भी दौर आता है,
सुख की घड़ी के नज़र आने वाला हुजूम,
दुःख के पलों में जानें कहाँ खो जाता है;
मतलबपरस्त इस दुनिया में, ज्यादातर
रिश्तों में दोगलापन ही नज़र आता है,
भावनाओं का जहाँ कोई मोल नहीं होता है,
और रिश्ता भी हैसियत देखकर निभाया जाता है;
आधुनिक दौर भी कुछ ऐसा ही है जिसमें, 
भावी पीढ़ी को संस्कार नहीं भेदभाव सिखाया जाता है,
खोने की कीमत नहीं बताकर,
सिर्फ पाने का मूल्य समझाया जाता है,
लोग पल-पल रंग बदलते रहते हैं, और-
इसे ही रंगीन ज़िन्दगी जीना बताया जाता है।

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---(Copyright@ भावना मौर्य "तरंगिणी")---