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कहना नहीं आया

कहना नहीं आया

कहना नहीं आया कभी भी,
इसीलिए लिखने लगे हम,
जिन्हें नहीं दिखते थे कभी,
उन्हें भी अब दिखने लगे हम;

जिसने जैसी चाही वैसी ही,
सूरत गढ़ ली पढ़कर मुझे,
और गुमनाम होने की चाह में,
दुनिया से छिपने लगे हम;

उम्मीदों के धरातल पर,
बस बंजर धरती ही मिली मुझे,
इसलिए खुद के ही दायरों में,
अब सिमटने लगे हम;

जब परवाह थी मुझे रिश्तों की,
तो किसी को नज़र भी न आये हम,
ज़रा सा बेपरवाह क्या हुए,
अब सबको ही खटकने लगे हम;

जब समीप थे, तो लोगों के लिए, 
तब बड़े बेमोल से थे हम; 
और अहमियत भी तब जानी सबने,
जब खुद के लिए थोड़ा-थोड़ा बदलने लगे हम;

सोचते थे लोग, कि उनकी उपेक्षाएँ,
हिलाकर रख देंगी मेरे अस्तित्व को,
पर अपने अस्तित्व बचाने के प्रयासों में,
और भी ज्यादा निखरने लगे हम;

खुद की चाहतों को पाषाण बना कर,
सबकी खुशियाँ चाही थी मैंने,
पर बदले में मिली बेरुखी की वज़ह से,
अब खुद की चाहतों के लिए भी पिघलने लगे हम; 

अब फर्क नहीं पड़ता इससे,
कि कोई क्या सोचेगा या कहेगा,
क्योंकि मेरे अस्तित्व का संघर्ष है ये,
इसलिए हर बंधन को परे कर सँवरने लगे हम;

गर मुड़ कर देखते तो शायद, 
गुमराह हो जाते फिर से,
इसलिए अपनी मंज़िल की राह पर,
बिना पलटे ही आगे-आगे बढ़ने लगे हम।
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---(Copyright@भावना मौर्य "तरंगिणी")---

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