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निगाहें पहरा देती हैं

निगाहें पहरा देती हैं

निगाहें पहरा देती हैं,
कि तू ओझल न हो जाये,
मेरी साँसे, मेरी धड़कन,
तेरे होने से चलती हैं,
इसलिए डरता है ये दिल,
कि तू मुझसे न खो जाये,

निगाहें पहरा देती हैं,
कि तू ओझल न हो जाये...

तेरी बातें, तेरी आँखे,
कुछ सम्मोहन सा करती हैं,
कि मरने का भी जो सोचूँ,
तड़प जीने की आ जाये,
मेरी मंज़िल वहीं जानम,
जहाँ तक तू लिए जाये;

निगाहें पहरा देती हैं,
कि तू ओझल न हो जाये...

तेरी एक-एक झलक जैसे,
नशा मदिरा सा करती है,
लगे तेरी छुअन ऐसी, कि-
आग पानी में लग जाये,
मैं डरती हूँ इसी से बस,
कि कहीं न तू बदल जाये;

निगाहें पहरा देती हैं,
कि तू ओझल न हो जाये...

तेरी जुबां में कशिश ऐसी,
कि पत्थर भी पिघल जाये,
बस एक उलझन में मेरी आँखें,
अब सोने से डरती हैं;
कि मेरी नज़रों के हटते ही,
कहीं तू गुम न हो जाये;

निगाहें पहरा देती हैं,
कि तू ओझल न हो जाये...।
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---(कॉपीराइट@भावना मौर्य "तरंगिणी")---