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दिल और दिमाग - एक संवाद

दिल और दिमाग - एक संवाद

एक बार दिल और दिमाग में लड़ाई हो गयी,
प्यार के किसी मसले को लेकर दोनों में रुसवाई हो गयी;

दिमाग ने दिल से कहा-
दोस्त हूँ मैं तेरा और तू मेरी सुन ले ज़रा!
बिना सोचे समझे न प्यार का कदम तू बढ़ा;
प्यार का रास्ता है झँझटों भरा,
बेमतलब के दर्द को न तू सिर पर चढ़ा।

दिल ने दिमाग से कहा-
दोस्त ये प्यार है मेरा, व्यापार नहीं है तेरा,
प्यार में नहीं देखा जाता नुकसान और नफा,
ये तो एहसासों का लेन-देन है, और है हर मर्ज़ की दवा,
हाँ सुकूँ भी है इसमें और दर्द भी है यहाँ,
इस सुख-दुःख के मिलन से ही तो,
चल रहा हैं जीवन का कांरवाँ।

दिमाग ने दिल से कहा -
जो तू मुझसे कह रहा वो मैं समझता हूँ सब,
प्रेम वो इबादत है जिसे नवाज़ता हैं रब,
पर आजकल प्रेम के नाम पर धोखों की भरमार हैं यहाँ,
जाने कब साथ होते हैं कब हो जाते हैं जुदा?
इसलिए मैं नहीं चाहता कि वो दर्द तू भी सहे-
प्रेम में धोखा खाकर घुट-घुट के जिये।

दिल ने दिमाग से कहा-
सब जानते हैं कि एक दिन सबको मरना ही है,
पर फिर भी मौत के डर कोई जीना छोड़ता हैं क्या?
मैं जानता हूँ कि प्यार की राहें होती है मुश्किलों भरी,
पर मैं बच सकता हूँ धोखों से, अगर साथ दोस्ती है तेरी।
अगर आपस में अच्छा तालमेल बैठा सकते हैं हम?
तो धोखा खाये बिना भी सच्चा प्यार पा सकते हैं हम।

दिल की बात सुनकर, दिमाग भी मुस्कुरा दिया,
कि कितने सरल शब्दों से, दिल ने उसको हरा दिया?
बोला दिमाग दिल से कि- दोस्त हूँ मैं तेरा,
जा करले तू मोहब्बत, मैं भी इसे समझ लू ज़रा,
ताकि कर सकूँ तुझे किसी धोखे से पहले ही मैं आगाह,
और सच्चा प्रेम ढूँढने में कर सकूँ तेरी मदद मैं,
ताकि तेरा प्रेम बने मिसाल और न हो तू गुमराह।

दिल ने दिमाग से कहा-
जानता हूँ दोस्त कि मैं हूँ कोमल बहुत,
ज़रा सी बात पर ही पिघल जाता हूँ मैं ,
पर जब लेना होता है कोई निर्णय मुझे,
तो बिना रुके तेरे पास ही चला आता हूँ मैं।
क्योंकि जानता हूँ कि तेरे बातों के तर्क होते हैं,
तेरे कहने से ही सब सतर्क होते हैं,
इसीलिए होती है मुझे कोई चिंता नहीं,
तू साथ है मेरे तो मैं न भटकूंगा कभी।

---(Copyright@भावना मौर्य "तरंगिणी")---

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