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ज़िन्दगी कैसी लगती है

ज़िन्दगी कैसी लगती है

कभी-कभी ये ज़िन्दगी बेजान सी लगती है,
अपनी होते हुये भी अंजान सी लगती है;
कब कैसे, कहाँ से इसमें लोग शामिल होते गये?
सब जानते हैं फिर भी हैरान सी करती है।
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कभी-कभी लगता है कि खुशियों का काफिला है साथ में,
तो कभी-कभी ये मुझे परेशान सी लगती है;
कहना आसान है कि ये मेरी ज़िन्दगी हैं,
पर मुझे तो ये ज़िन्दगी किसी का एहसान सी लगती है।
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ज्यादा प्यार और देखभाल की आदत नहीं है मुझे,
इसलिये ज्यादा मिलने पर ये भी मुझे अब अपमान सी लगती है;
कुछ चाहतों की ताबीर तो ख्वाबों मे भी सम्भव नहीं,
और कुछ ख्वाहिशें तो कभी न पूरा होने वाली अरमान सी लगती हैं।
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किसी-किसी को मिलती हैं खुशियाँ सारे ज़हान की,
पर किसी-किसी को ये ज़िन्दगी शमशान सी लगती है;
अजीब उलझन है कि अपनी ही ज़िन्दगी पर भी जोर होता नहीं है हमारा,
तभी तो अपने ही घर में ये बिन बुलाये मेहमान सी लगती है।
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(Copyright@भावना मौर्य "तरंगिणी")

नोट: मेरी पिछली रचना आप इस लिंक के माध्यम से पढ़ सकते हैं-